1 नवंबर 2009

रात

सारे दिए बुझ चुके है ,

रात करवट ले रही है पिछले पहरमें ,

कहीं चमगादड़ निकला है टहलने

फ़िर उल्टे लटककर सो जाएगा एक रातके इंतज़ारमें ,

जुगनूकी चमक और उल्लूकी चमकती आँख

रातकी कालिखके रोशन दिए मध्धमसे ,

चीख रहा है सन्नाटा कसमसाकर

एक हलकीसी दस्तक भी गूंजती है शोर बनकर ...

करवटकी सिलवटे रतजगे की दास्ताँ दोहराती है ,

कहीं आहें जागती है तो कहीं मिलनका मौसम छाता है ...

सुनी सी सड़क थक गई थी दिन भर वो भी अब सुस्ताती है ,

चाँदकी कहानी और सितारोंकी लोरियां सुने जाती है ....

तभी रोज एक प्रसूतासी रात पिछले पहर दर्दसे कराहती है ,

और फ़िर एक नए दिन को जनम दे जाती है ......

2 टिप्‍पणियां:

  1. रात तेरे कितने रूप.....
    वाह जी सुंदर रचना है जी

    उत्तर देंहटाएं
  2. तभी रोज एक प्रसूतासी रात पिछले पहर दर्दसे कराहती है ,

    और फ़िर एक नए दिन को जनम दे जाती है ......
    yahi satya hai aur nisarg ki parikrama bhi,sunder rachana,andhere ki hulchul ke baad din ki kiran ati hi hai.

    उत्तर देंहटाएं

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