15 अक्तूबर 2009

एक कश्मकश फ़िरसे!!!!!!!!!!!!!!!!

कुछ गुजरे हुए पल समेटकर रख लूँ ,

कोई सरकती रेत के कण को मुठ्ठीमें जकडकर रख लूँ ,

मेरे वो अनमोल पलों को कैद कर लूँ अपने जहनमें ऐसे ,

मुझसे कहीं न बिछड़ जाए कहीं .....

तेरी यादोंसे तो सजे थे जो दिन गुजारे थे हमने तुम बिन ,

आज वो यादें मुझसे बिछड़ ना जाए ये डर लगने लगा है ....

कहीं कोई नया मोड़ आ रहा है जिंदगीका इस राह से परे ,

अनजानी राह पर तुम बिन चलने को डर लगता है .....

फ़िर सोचते है ये तो कोई नया सिलसिला नहीं ,

ये पहली बार नहीं ये आखरी बार भी नहीं .....

बस कोई शख्सियत मेरे वजूद की आदत न बन जाए

ये ही मेरी असमंजस का एक हल लगता है ....

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