12 सितंबर 2009

मार पड़ेगी मुझे भी

तेरे इंतज़ारमें मेरा दिन निकलता है ,

तू ना आए तो वक्त ही नहीं कटता है ,

तुझे मिलकर जैसे सारी खिड़की खुलती है ,

क्या समजे आप मैं तो अखबारके लिए ये कहती हूँ .....

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एक बक्सेमें हर दम सदायें आती है ,

संगीत के सूर सजाती है और मन को बहलाती है ,

बटन से ओन ऑफ़ हो सकती है बस इसीमे काम आती है ,

जो मेरी हरदम नॉन स्टाप बीवीकी याद दिलाती है .....

और कभी ये गलती भी हो जाती है ,

ये बिना हड्डी की जबान बीवी को रेडियो का नाम दे जाती है ....

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही ख़ूबसूरत रचना...

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  2. तुझे मिलकर जैसे सारी खिड़की खुलती है ,

    क्या समजे आप मैं तो अखबारके लिए ये कहती हूँ .....

    ha ha waah mast maza aagaya:)

    उत्तर देंहटाएं

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