20 अगस्त 2009

कांच का घर ......

तुम ना आए थे जब मेरी जिंदगीमें

कितना सुकून था इसकी सतह पर तैरता हुआ ....

तुम बारिशके पानी की तरह इसकी मिटटीमें कुछ घुले ऐसे

और जर्रे जर्रेमेंसे गुजर पतली दरारोंसे मुझमें समाते गए .....

सतह पिघलती रही तुम्हारे धारोंकी तपीशसे

और पिघलने लगी में मोम बनकर बह चली

किस ओर बह चलूं यहांसे ??

अब ये तुम ही मुझे बताते जाओ ......

जहाँ मिली थी कहीं ढलान बह चली थी

जाना था कहाँ वो नाम पता भी भूल गई थी

हर मंज़र पर ये खुबसूरत भ्रम था मेरे संग संग चला

और मैं खुशबूकी खोजमें कांचकी दीवारोंसे टकराती रही ...........

देखो ये कांच का घर मेरा ...!!!!

दीवारें रंगी हुई है मेरे एहसासोंके रंगोंसे

और आख़िरकार इस मकानको देखो ...

अब मेरे घरकी सूरत मिल गई .....

3 टिप्‍पणियां:

  1. तुम बारिशके पानी की तरह इसकी मिटटीमें कुछ घुले ऐसे

    और जर्रे जर्रेमेंसे गुजर पतली दरारोंसे मुझमें समाते गए .....

    सतह पिघलती रही तुम्हारे धारोंकी तपीशसे

    और पिघलने लगी में मोम बनकर बह चली

    किस ओर बह चलूं यहांसे ??

    sunder sunder behad khubsurat lines,ehsaas jaise mann mein ghul gaye.waah.

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