16 अगस्त 2009

तन्हाई के आलममें .....

मुझे तनहा छोड़ दो आज ,

मुझे कोई सवाल ना करो कोई ,

जिंदगी के किस मकाम पर खड़ा हूँ ?

कौन दिशा जाना था ? कहाँ आकर थमा हूँ ?

ये जरा सोचने की इजाजत दे दो ,

मुझे बस कुछ पल की तन्हाई दे दो .........

मैंने एक जिंदगी चाही थी अपने लिए ,

जी न पाया कभी ये अपने लिए ,

तुमसे तो क्या गिला शिकवा कर सकू हूँ ?

मुझे अपने आपसे ये शिकायत करने दो आज ..........

एक कांचकी दीवार का घर हो ,

मैं तुम्हे देखूं तुम मुझे देख सको ,

बस कुछ और महसूस ना हो मुझे ,

न तुम्हारे आने पर खुशबू बिखरे ,

न दिल धडके ,न नजर ही मिले ,

बस एक दिन फुरकत का दे दो ..........

कल और निखरकर आऊंगा ,

नए ख्वाब सजा दूंगा ,

थोड़ा सा हस लूँगा ,थोड़ा सा गुनगुनाऊंगा ,

बस आज ये कुछ पल खामोशी के हवाले कर दो .......

4 टिप्‍पणियां:

  1. थोड़ा सा हस लूँगा ,थोड़ा सा गुनगुनाऊंगा ,
    बस आज ये कुछ पल खामोशी के हवाले कर दो .......
    यही एक पल तो हर एक को वांछित है.
    बहुत खूब लिखा है.

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  2. बहुत ही अच्छे शब्दों और भावों से पिरोई कविता...

    उत्तर देंहटाएं
  3. जी न पाया कभी ये अपने लिए ,

    तुमसे तो क्या गिला शिकवा कर सकू हूँ ?

    मुझे अपने आपसे ये शिकायत करने दो आज ..........
    sach kabhi kabhi aisahi mehsus karte hai,sab kuch chod tanhai mein khud ke liye soche,koi aawaz nahi de tab.dil ki aawaz ko sunder alfaz diye hai.bahut khub.

    उत्तर देंहटाएं

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