11 अगस्त 2009

क्यों ??

जानती हूँ न आओगे कभी मुड़कर मुझे मिलने ,

फ़िर भी ना जाने क्यों पयगाम भेजती रही मिलने का ???

जवाब ना आएगा भूलेसे कभी तुम्हारा ,इंतज़ार उम्रभर का होगा ,

क्यों फ़िर भी हर रोज एक उम्मीदमें जीकर पाती भेजती हूँ ???

न शिकवा कर सकते है तुमसे ,ना वफ़ाकी कोई आस है अब ,

बस हरदम तुम्हारा ख़याल ही हमारे आस पास है .......

5 टिप्‍पणियां:

  1. क्यों फ़िर भी हर रोज एक उम्मीदमें जीकर पाती भेजती हूँ ???

    न शिकवा कर सकते है तुमसे ,ना वफ़ाकी कोई आस है अब ,

    sach kuch rishtey bas umeed ke sahare hi jitey hai hum,yahi umeed hame agli subhah ka intazar bhi karwati hai,dil janta hai,kewo kabhi nahi aayega,phir bhi ,ek umeed.....,bahuthi bhavuk lines,badhai.

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  2. wahhh kya baat hai.....waise aap thek to hai ? i think kuch to gadbad hai??

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