3 अगस्त 2009

फर्क तो बस इतना सा ....

पूछा कभी बहारोंसे खुशबू कहाँ से लाती हो ?

कहा उसने खुशबू कहाँ है ? ये तो आपका नजरिया है .......

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मुझे कभी अपनेसे प्यार करना कहाँ आया ,

ये तो तुम थे जिसने मुझे प्यार करना सिखाया ,

अपने आपसे नहीं बेगरज किसीसे प्यार करके तो देखो ,

जहांसे ही दिल भरकर प्यार मिल जाया करेगा ....

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क्या फर्क है जन्नतमें और जहन्नम में ?

फर्क तो बस नजरिये का ही है ....

क्या होती है इब्तदा और इन्तेहाँ ?

फर्क तो बस नजरिये का ही है .....

जहाँ इन्तेहाँकी आखरी कड़ी है

वहां पर ही किसीकी इब्तदा होती है .........

3 टिप्‍पणियां:

  1. फर्क तो बस नजरिये का ही है .....

    जहाँ इन्तेहाँकी आखरी कड़ी है

    वहां पर ही किसीकी इब्तदा होती है .........
    waah sahi fark bas nazariye ka hai.bahut khub

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  2. जी हाँ! सब नज़रिये का ही मुद्दा है
    अच्छी रचना

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