29 मई 2009

आरजू एक शमा की .....

जिनकी तमन्ना को कुछ जवां होने दो ,

तक़दीरकी लकीर को हम पर मेहरबां होने दो ,

कलमें जगी थी उम्मीद थोडी रोशन सी थी ,

बस उसे अब प्यार की दास्ताँ होने दो .....

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जुस्तजू किए थे हम कि खाक हो जाए हम भी परवानो की तरह ,

खाक हो जाने की उस शमा की तक़दीर न थी बुझ गई वो मझधारमें ,

जमें हुए उस शमाके अश्क पर कुछ देर तो हम भी रुक लिए ,

तक़दीरसे लड़ लिए की क्यों हमारी किस्मतमें फ़ना होना न था .........

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