26 मई 2009

कुछ तक़दीरसे मिला ....

तराशे थे जिंदगीके संगमरमरी ख्वाबोंमें तकदीरों के दायरे ,

जिंदगीके हर रंग लग रहे थे तब प्यारे हमें बड़े दिलकश भी थे ,

किसीके आने का इंतज़ार कर रहे थे हम एक नुक्कड़ कर ,

इसे तक़दीर कहें या एक टुटा ख्वाबों का मंज़र ? सामने से तुम्हारी डोली गुजर रही थी .....

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बस एक बहाना ढूंढ लिया मैंने इस जिंदगी को जीने के लिए ,

एक मुस्कराहट का पता पूछ लिया उस फूलसे ,तितली से ,

बहते झरनोंसे मुझे कुछ संगीत मिला गया ,और अधूरे फ़साने को

कुक रही कोयलसे एक नया गीत भी मिल गया .....

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