21 अप्रैल 2009

चलो हंस भी लेते है कभी ऐसे ही ...

ट्राईसिकल पर सवार होकर ,निखर गया बाइसिकलका प्यार ॥

बाइसिकलकी नजर मिली एक मोटरसे ,

तो मोटर साइकल बन उडी हवा पर होकर सवार .........

गोवाके ट्राफिकसिग्नल पर नजर लड़ गयी

उसकी एक पुरानी शेवरोलेट गाडी से ,

एक नदीमें दोनों चल दिए वो बोटमें होकर सवार ..........

उड़ते एरोप्लेन के पहिये पर बांध झुला मैं हवा खा रही थी कुछ देर के लिए ,

ब्रेक लगे पायलटने तो मैं गयी समुन्दर के अन्दर ,

सब मरीन के अन्दर से मछली से बात कर रही हूँ अभी .......

बाहर आकर बताती हूँ सफ़रका अफसाना ,

ये तुक्का आया तब जब हुआ साइकलमें हुआ था मेरी पंक्चर ........

6 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया है... और अचछी रचना की उम्मीद लगे बैठा हूँ.

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  2. aise bhee kaise bhee, hasne hasaane kaa ye andaaj pasand aayaa, kya gajab kee kalpana hai, likhtee rahein.

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  3. kya kahun.......kaise taarif karun.........?
    kya poochu kaise likh lete ho sab kuch ......pata nahi .......

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