17 मार्च 2009

और फ़िर सिलसिले चल पड़ते है ......

दिनकी हर किरण से तुम्हारे मिलनेकी आस बंध जाती है ,
तुम्हारा जब दीदार नहीं होता तब ख्वाबोंमें मिलने के सिलसिले चल पड़ते है ....
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ये दिल की दास्ताँ भी अजीब है ,
ये यूँ ही कभी गुस्ताखी पर उतर आता है ,
मौसम जब छाया था बहारोंका तुम्हारे आने पर ,
और वह तब हिजर के नगमे सुना रहा था .....
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तुम शायरी हो कोई या हो कोई नाजुक सी ग़ज़ल ....
न जाना तुम्हे क्योंकि हम तो सिर्फ़ अल्फाजोंके कायल है .....
नगमा बनकर आ जाओ या रुबाई बनकर ये हमें नहीं पता .....
हम तो तुम्हारी आवाज़में डूब जाते है इस कदर की होश गूम हो जाते है ..........
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