4 फ़रवरी 2009

एक बार फ़िर ...........


कौन थी वह ?

कहांसे आई थी ?

अजनबी फ़िर भी जानी पहचानी सी लगी ....

बस पलभर का साथ निभाकर चली गई और मुझे जीना सिखा गई .........


एक बार फ़िर मेरी जिन्दगीमें बहार बनकर आ जाओ ,

एक बार फ़िर मेरी नींदमें सपना बनकर सज जाओ ,

एक बार फ़िर परदे के पीछेसे निकलता हुआ चाँद बन जाओ ,

एक बार फ़िर मेरे अरमानोंको सहला जाओ ,

एक बार फ़िर मेरी तनहा रातोंमें सितारा बनकर चमक जाओ ,

एक बार फ़िर मेरे दिलमें धड़कन बनकर धडक जाओ ,

एक बार फ़िर मेरी तक़दीर की लकीर बन जाओ ,

एक बार फ़िर मेरी यादोंमें बस मुझे सुकूनभरी नींद सुला जाओ ,

एक बार फ़िर तुम बिन जीने के लिए तनहा छोड़ जाओ ...........

3 टिप्‍पणियां:

  1. आप तो ईद का चाँद हो गयीं हैं आपसे कभी रूबरू होने का बहाना मिले!

    चाँद, बादल और शाम

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  2. भीतर की पीड़ा को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं।
    बहुत बढिया!!

    उत्तर देंहटाएं

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