24 फ़रवरी 2009

दहकती है मय फ़िर भी ....

रास नहीं आती पतझड़को बहार कभी कभी ,

दिल को टूटकर बिखरना है तेरी राहमें अभी अभी ,

बुलाने पर मेरे तुम दौडे आए हो जब भी जब भी ,

पर आज दिल अपना छोड़कर जाओ मेरे पास आज और अभी अभी ........

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कुछ सिलवटोंकी तह मत खोलो ,

कुछ जज्बातोंको दिलकी कैद से आझाद करने की चेष्टा मत करो ,

कुछ खयालोको सुलझानेकी कोशिश मत करो ,

कुछ ख्वाबोंकी ताबीरकी ख्वाहिश न करो ,

ये सिलवटें हमारी अमानत है,

दुनियासे छुपकर बैठी ख़ुदसे ख़ुद की पहचान है .........

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थिरकती है साँस कभी बुलबुलोंसी ,

महकती है आस कभी खुश्बुओंसी ,

दहकती है प्यास कभी शोलोंसी ,

बहकती है मय खाली पैमानोंमें भी कभी कभी .....

आस जब साँसमें कुछ ऐसे घुलती है जो ......

दहकती है मय फ़िर भी वह बहकती प्यास बुझाती है ......

4 टिप्‍पणियां:

  1. आस जब साँसमें कुछ ऐसे घुलती है जो ......
    दहकती है मय फ़िर भी वह बहकती प्यास बुझाती
    bahut badhiya

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  2. अति सुंदर...भावपूर्ण रचनाएँ...

    नीरज

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  3. बहुत सुंदर भाव युक्‍त रचना.....अच्‍छा लगा पढकर।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छा प्रयास है , बहुत सुंदर !!
    शुभकामनाएं........

    उत्तर देंहटाएं

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