21 फ़रवरी 2009

यहांसे मेरा नाम गंगा है :देवप्रयाग



हमारा प्रोग्राम कुछ ऐसा बना की दो दिन के बाद दिल्ही जाना है ।अब क्या किया जाय ? हमारे पास एक नकशे की किताब थी .कुछ नया ॥कुछ अनसुना सा ..मन्दिरवाले महाराज से भी पूछ लिया .जगह तय हो गई जाने के लिए . सुबह थोड़ा नाश्ता साथ लेकर पहुँच गए पहाड़ों में जानेवाली बसों के अड्डे पर .इन बसों में बैठने का नशा भी अनोखा होता है . जब ऊँचे नीचे जाते रास्तों पर चल पड़ती है ,बल खाती है तब हम पूरे के पूरे इधर से उधर हिलने डोलने लगते है .गर अगली सिट का हैंडल न पकड़ा हो तो लुढ़कना तो लगभग तय ही है . लेकिन ड्राइवर बहुत ही चौकस और होशियार होते है . पहाडियों की ये बसें काफी छोटी होती है .उनमे जीतनी सीटें हो उतने ही यात्री लिए जाते है ...


मुनीकी रेती से बदरीनाथ वाले रस्ते पर हम आगे जा रहे थे ।यहाँ से अब सचमुच हिमालय की गोद में आ जाने का एहसास होता है . ठंड महसूस होती है .रस्ते की एक और है हरेभरे पेड़ों से आच्छादित ऊँचे पहाड़ और दूसरी और है गहरी खाईमें नीचे लचकती , बल खाती चाल से चलती हुई गंगा नदी ॥कभी ऊपर तो कभी नीचे देखते हुए प्रकृति के इस नज़ारे को देखते हुए हम आगे बढ़ रहे थे .रिवर राफ्टिंग के खेल प्रेमियों के पड़ाव बीच बीच में आते रहते थे .यहाँ गंगा और दूसरी कोई और पहाड़ी नदी में खास अन्तर नहीं नजर आता है .उछलते कूदते पानी की तरंगों से जो ध्वनि उठती है उस ध्वनि का अनंत गान सुनते हुए हम आज जा रहे है देव प्रयाग ....


बदरीनाथ केदारनाथ की यात्रा पर जाने वाले सभी पंच प्रयाग के नाम से परिचित होते है ।उन्ही में से एक है देवप्रयाग . इन प्रयागों में विभिन्न नदियों का संगम होता है जो सब आगे चल कर गंगा नदी में विलीन हो जाती है .तीन घंटे का बस का सफर अब समाप्त होता है .बस से उतरकर हमने गाँव में जाने का रास्ता पूछा .वहाँसे नीचे की ओर जाने वाली एकदम छोटी -संकरी गलियों में हम चलने लगे .एक छोटी सी पुलिया आई . वहां पर खड़े रहकर नीचे की और जरा देखो ...हमारे ठीक नीचे थी भागीरथी नदी और उसका तुफानी समुन्दर की तरह उछल के वादियों में गूंजने वाला रौद्र गान .....उस प्रचंड ध्वनि और प्रचंड गति वाली दूधिया सफ़ेद रंग की भागीरथी वही है जो गौमुख से निकलकर अपने में रास्तें में मिलने वाली कई और नदियों को समाकर इधर तक आई है .प्रतिमाके समान ! इस नज़ारे को देखकर मैं स्तब्ध ही रह गई और अनिमेष नयनों से उसे ताकती रही ...वहां से हम दुसरे छौर की और बढ़ गए .सुबह का नाश्ता तो बल खाती बस में कबका हजम हो चुका था . एक छोटी सी दुकान में चाय नाश्ता करके पतले रस्ते पर गुजरते हुए हम आगे बढ़ने लगे ...


उस पतली गली के छौर पर एक बहुत नीचे उतरके जाने वाला घाट का रास्ता आया ।उसकी बहुत ही बड़ी सीढियाँ उतरते हुए हम नीचे triangle जैसे स्थान पर पहुंचे तो हमारे दायीं ओर थी रुद्र स्वरूप भागीरथी और बायीं ओर थी उसको आके यहाँ मिलने वाली अलकनंदा ॥दूर से तो ऐसा ही भ्रम हुआ की यह कोई नदी नहीं है पर एक हरा सपाट शीशे की सतह की तरह एक जगह है . दोनों ओर काले ऊँचे पहाड़ .बिल्कुल स्थिर दिखने वाला पानी का प्रवाह जिसकी गति शायद भागीरथी से भी तेज थी .दोनों नदियाँ मिलती नहीं है पर प्रचंड वेग से यहाँ पर टकराती है .दूध जैसे सफ़ेद झाग वाली प्रचंड वेग से उछलती हुई भागीरथी और प्रचंड वेगको अपने गर्भमें समाकर सतह पर चिकने घड़े की तरह शांत दिखती हुई अलकनंदा यहाँ पर मिले और ये बन गया देवप्रयाग ....


किसी गुजराती दानवीरने यहाँ पर पक्का घाट बनवाया है । यहाँ पर आप अपने पितृओं का तर्पण भी कर सकते है . यहाँ का गंगाजल शायद सही मायने में शुद्ध गंगाजल की तरह आप किसीको प्रसाद की रूप में दे सकते है .बद यहाँ से दोनों गले मिलकर ( या एक दूसरे से भिड़ कर ) हंसते हुए आगे बढती ये हमारी नदियाँ ...वहां पर तिकोने घाट पर बैठकर दोनों को लिपट के आगे जाते हुए देखना एक विरल अनुभव है .ये जगह सड़क से काफी नीचे उतरकर आती है .सड़क पर चलने वाले वहां यहाँ से खिलौने की तरह नजर आते है . आगे बड़ी सी बस्ती भी है .यहाँ पर दोनों प्रवाहों के मिलन के स्थान पर पानी पैर रखकर दो घंटो तक हम बैठे रहे तब जैसे हमें आनंद की समाधि सी लग गई .यहाँ लोगों की ज्यादा भिड़ भाड़ नहीं होती है ...


किंतु मैं ये कहूँगी की दिखने में बिल्कुल आम नजर आनेवाली इस जगह पर मुझे वह खुशी मिली जिसे शायद शाश्वत शान्ति , या अलौकिक आनंद कह सकते है . सबसे अहम बात यह है की उदगमस्थान से यहाँ तक गंगा को सिर्फ़ भागीरथी के नाम से ही पुकारा जाता है और इस संगम स्थान के बाद उसे गंगा के नाम से पहचाना जाता है जो कोलकातामें गंगा सागर से मिलती है .(कोलकाता में इसे हुगली कहते है ) .इस जगह पर सुभाष घई की फ़िल्म 'किसना' का एक गीत भी फिल्माया गया है .वापसी में ढलती हुई शाम के साथ फिर वोही अदभुत नजारोंको देखते हुए हम ऋषिकेश की और लौट पड़े .नक़्शे में देखकर हम इस जगह पर गए थे . हमारे प्रवास में यह एक सीप में छुपे मोतीकी तरह बंद हो गई जैसे की मैंने आपको मुनी की रेती वाले अंक में बताया था .एक सुखद अनुभव , एक शांत परिचर्या ,एक अदभुत और अलौकिक आनंद की अनुभूति ..........

8 टिप्‍पणियां:

  1. bahot dino se anupasthiti ke liye muaafi ......... achha smaran likha hai aapne badhiya aur rochak jaankari.....



    arsh

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  3. मैं आपकी बात से सहमत हूँ...देवप्रयाग एक ऐसा स्थान है जहाँ जाने के बाद आपको जो अनुभव होता है वो सदा के लिए आपके मन में बस जाता है...इतनी तेज बहती नदियों को इतने पास से देखना एक रोमांचक अनुभव है...धन्यवाद आपका इस पोस्ट के लिए...

    नीरज

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  4. प्रितिजी

    बढिया।
    सस्मरणो के साथ हमभी घुम आये।

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  5. समय निकाल कर यहॉ भी पधारे जी।

    HEY PRABHU YEH TERA PATH
    http://ombhiksu-ctup.blogspot.com/

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  6. badrinath jaate hue kai baar dil mein aaya ki kuch time devparyag mein sangam wale jaghe par ruka jaye par nahi ho paya ab kisi din spacial davparyag jaunga 1/2 dino ke lie

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