15 फ़रवरी 2009

अनदेखी अनजानी सी : शमा

मैं संजय सूरी....
मेरे शहर श्यामपुरके दैनिक अखबार " जागरण्" का एक पत्रकार...
उम्र है सिर्फ ३२ साल, पर मेरी कलमकी तेजी और जादूने मुझे जल्द ही एक ऊंचे मकाम पर पहूंचा दिया है. इस सालका श्रेष्ठ नवोदित पत्रकारका पारितोषक मुझे इस बार मिलने जा रहा है, किन्तु इस बातका मुझे जरा भी उत्साह नहीं है.....क्यों???
इसके पीछे एक कहानी है......
आजसे आठ साल पहलेकी बात है. नया नया आया था इस शहरमें अपने वतन बिहारसे..अब इस श्यामपुरके पोश इलाके के.के.रोड पर पिनाज सोसायटीमें किराये पर मकान ले रखा है. सोसायटीके सबसे पीछेकी कतारमें कोमन प्लोटके पास... मेरे कामके हिसाबसे यहां सिर्फ शान्तिका माहौल होता है. यहांसे मेरा दफ्तर भी पास पडता है.
रातको कोमन प्लोटमें सोसायटी के सभी उम्रके लोग यहां इकठ्ठा होकर गपशप करते है. सभी अपने रस और रुचिके अनुसार टोली जमाकर बैठकर वहां हरे भरे लॉन पर बैठ जाते है. मेरे हमउम्र आठ दस युवकभी है. शोएब उसमेंसे एक है. वह रोज वहां आता है. और उसके साथ मुझे शायद सबसे ज्यादा मजा आता है. रीपोर्टींगके अलावा मैंने एक अपना एक कोलम भी लिखना शुरू किया. यहांके विविध लोगोंकी जिन्दगीसे जुडे कई किस्से यहां सुनता तो था ही . उस पर से प्रेरणा लेकर एक संदेशके साथ लिखा गया कॉलम पहले ही हफ्तेसे काफी लोकप्रिय हो रहा था. इसे लेकर मेरे अखबारके वाचकोंकी संख्याका भी काफी इजाफा हुआ . इससे खुश होकर मेरे तंत्री एवम मालिकने मेरे वेतनमें भी काफी इजाफा कर दिया. बडा ही खुश था इन दिनों मैं................

एक दिन एक अजीबसा सिलसिला शुरू हुआ मेरे साथ. रोज एक गुलाबी लिफाफेमें मेरे लिये एक खत आता था. मेरी कोलम जिसका नाम था " जीना इसीका नाम है" उसकी तारीफ सिर्फ आठ दस पंक्तिमें लिखी हुई होती थी. उस पर न किसीका नाम होता था ना पता...
आठ दस दिनके बाद मैंने डाक विभागके मिश्राजीसे इस बारे में पूछताछ की. उन्होंने बताया कि ये डाक तो सुबहमें लेटरबोक्ससे ही उन्हें मिलती है. कौन डाल जाता है कुछ पता नहीं....
खैर ये खत आने का सिलसिला यूंही चालु ही रहा.
अब इन खतोंमे तरह तरह की जिन्दगीसे जुडी बातें भी लिखी रहती थी. मुझे तो जैसे अपनी कॉलमका सारा मसाला बैठे बिठाये मिलने लगा.लेकिन ये खतके रहस्यकी गुत्थी मैं सुलजा नहीं पा रहा था. मैने एक तरकीब निकाली . इस खतकी बातोंकी जमकर आलोचना करनी शुरू कर दी. खूब मजाक भी उडाने लगा. पर ये खतोंका सिलसिला फिर भी न रुका.........
अब मेरे दिमाग पर ये रहस्यमय व्यक्तिका पता लगानेकी धून सवार हो गई. छोटेसे सील परसे मैं उस कुरियर कंपनीके पास जा पहूंचा. उन्होंने भी मिश्राजी वाली बात दोहराई. और पैसे तो कैशमें हर वक्त जो व्यक्ति ही आकर दे जाता है वह बहरा और गूंगा है.

एक दिन ये सिलसिला टूटा...
एक ..दो...तीन.... पंद्रह दिनों तक खत नहीं आया. मेरी बैचेनी दिन ब दिन बढने लगी...
एक महिना बीत गया. आज् मैं सोसायटीकी रात्रिसभामें बिलकुल खामोश सा बैठा हुआ हूं. मेरे जहनसे वह खत नहीं हट पा रहे है. शोएबने मेरी खामोशीकी वजह पूछी. मैने पूरी दास्तां बताई. उसी वक्त शोएबके मोबाइलकी रींग बजी. शोएबने मुझे अपने साथ चलने को कहा. मैं उसके साथ चल दिया.घर पहूंचते ही शोएबने बताया उसके जीजाजी का एक्सिडेंट हुआ है. मैं अम्मीजान को लेकर होस्पिटल पहूंच रहा हूं. और तुझे एक जिम्मेदारी सौंप रहा हूं. मेरी बहन शमा अंदरके कमरेमें सो रही है. मेरी चचेरी बहन नजमा आपा एकाध घंटेके भीतर यहां पहूंच रही है. तुम उसके आतेही घर चले जाना. और शमा कुछ मांगे तो फ्रीजसे निकालकर उसे दे देना.
मैं कमरेमें इधर उधर घूम रहा था.शोएबके राईटींग टेबल पर एक डायरी देखी. उसका एक पन्ना पलटा. एकसे बढकर एक खूबसुरत शेर, शायरी, नजमें और गजलोंका जैसे नायाब खजाना हाथ आ गया. मैं तो बस मदहोश होकर पढने ही लग गया...

अचानक अंदरके कमरे से आवाज आयी. शमाकी आवाज थी," अम्मीजान जरा पानी देना तो..." ऐसा लगा जैसे कोयलकी कूक सुनी हो. मैं जल्दी ही फ्रीजसे पानीका जग लेकर पहुंच गया. एक अजनबीको अपने कमरेमें देखकर वह चौंक पडी. मैने हकीकत बताकर अपना परिचय दिया. जब वह सोने लगी तो मैंने देखा ये तकरीबन अठारह उन्नीस सालकी इस लडकीके दोनों पैर पोलियोग्रस्त थे. पर उसकी आंखे जिन्दगीकी चमक लिये हुए थी. चेहरा एक जीती जागती गजलका शब्द रुप था. वह सोने लगी तो मैं कमरे से निकल गया...
मैने डायरी फिरसे पढनी शुरू की. अब चौंकनेकी बारी मेरी थी. मैने डायरी का नाम पढा. शमा बख्तावर... लिखावट वही जो मेरे पर आये उन अनगिनत खतोंमें हुआ करती थी.
अब मेरी नजर बाजुमें पडी हुई एक डाक्टरी रिपोर्टकी फाईल पर पडी. जिसपर भी शमा बख्तावर लिखा हुआ था. मैने पलटकर पढा. उसके दिलमें जनमसे ही छेद था. उसके जीवनका अंत कभी भी हो सकता था. जो बीते वह दिन ..कब ये डोर टूटे उसे कोई न जानता था. मौतकी आगोशमें सोई इस लडकीने मुझे जीवनकी उंचाई तक पहूंचा दिया था. मैं उसका कर्जदार बन चूका था.
डायरीके अंतमें एक पोस्ट न किया लिफाफा मिला. जो शायद कल ही लिखा था.
" आप मेरी खोज खबर कर रहे होंगे पर अब मैं ऐसे छूप जानेवाली हूं जहांसे मुझे कोई ढूंढ
नहीं पायेगा. मैं तो आपको पहचानती हूं .आप शोएबभैया के दोस्त हो. मैने आपके बारेमें सुना है पर आपको कभी देखा नही है.अल्लातालासे दुआ करुंगी मरनेसे पहले मेरी आरझू पूरी हो जाये आपको एक बार देखने की. डॉक्टरोंने जिस लडकीकी आयु सिर्फ ५ से ७ साल तक बताई थी उस लडकीको आपकी कॉलमने आज तक जिन्दा रखा है..शुक्रिया मेरे दोस्त.......मैं शमा हूं और जल जाना मेरी फितरत..अलविदा...."
कमरा छोडते वक्तकी उसकी हल्की सी मुस्कराहट इस पहचानका सबूत थी....
नजमाआपा आ गई और मैं अपने घर लौट आया हूं पर नींद अब कहां आयेगी????
दो दिन के बाद ही शमाका इन्तेकाल हो गया. शायद मुझे देखने की इच्छा पूरी जो हो चूकी थी. वह दिन मेरी कॉलमका आखरी दिन बन गया....

इनामकी रकम मैने शमाके नाम एक चेरिटेबल ट्रस्टको दानमें दे दी. और शमाकी उस खूबसुरत डायरीको पुस्तकका रुप देकर दुनियाको पहूंचाया उसकी बिक्रीसे मिली पूरी आय गरीब परिवारके दिलके मरीजोंके मुफ्त इलाजके लिये खर्च की जाती है.....

ये मेरी उस अनजानी प्रेरणा बन जानेवाली प्रशंसकको श्रध्धांजलि थी............

ये एक काल्पनिक कहानी है इस कहानी का कोई जीवित या मृत व्यक्ति के साथ लेना देना नहीं है ।

मेरे विचारों में जो सकारात्मकता है वो किसी एक व्यक्ति की प्रेरणा ही है जिसके विचारोंने मुझ पर सबसे बड़ा असर छोड़ा है .

3 टिप्‍पणियां:

  1. मैं आपसे मिलना चाहता हूं। वो किताब भी और कॉलम भी पढ़ने की ख्वाहिश है।

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  2. yeh dastan jo haqeeqat hai padhkar aankh mein aansoo aa gaye,dil bahut dukhi ho gaya..........kya aap uski wo kitaab padhwa sakte hain aur wo column bhi jiski wajah se mashhooriyat mili.
    is dastan ne nishabd kar diya.

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  3. preeti ji maine aapka introduction dekha aapko kavita likhne ka shauq hai. agar ho sake to mere blog ke lie kavita likhie. kavita me koi prerna di gai ho. aur han agar waqt mile to mera blog bhi dekhiega.
    www.salaamzindadili.blogspot.com

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