10 फ़रवरी 2009

ये जिंदगी की दास्ताँ भी अजीब है ....




मेरी खामोश निगाहों को जो पढ़ लेते तो तुम्हारे दिल में ये ख्याल ही न आता ,

तुम किसी ओर के न होते ,गर तुम्हे अपने दिल पर ही पूरा ऐतबार होता .......

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इश्क में तो काम कर जाती है ये कातिल नज़रों की जुबान ,

लब यहाँ खामोश ही हो जाते है ,

ज़ुकती है निगाहें तुम्हारा तसव्वुर हो जाने पर ,

तुम्हारी फुर्कत में बहे हुए आंसू हाले दिल बयाँ कर जाते है ।

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जिन्दगी की दास्ताँ भी कुछ अजीब है ,

वोही हमसे दूर है जो हमारे करीब है ,

सारी दुनिया से जीत के भी अपनों से हार जाते है ...

क्योंकि हम दिलसे मजबूर है,उसके आगे जूक जाते है ,

आखरी फ़ैसला रहता है यही हम हारकर भी जीत जाते है ....

प्यारसे भरी इस कश्मकशको मुकाबला तुम न समजो,

हम चाहे ग़ैर क्यों न हों तुम हमें चाहो तो हमें अपना समजो


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