19 दिसंबर 2008

रेतघड़ी



"अरे हाँ ! विपुल ,जरा सुनो तो !! मैं दो दिन अस्पताल नहीं आ पाउंगी ।मेरे पेशंटको तुम ही देख लेना !!"

"क्यों ?"

"घर जरा ठीक करना है और थोड़े आराम की भी जरूरत महसूस होती है ।"

"अच्छा मैं चलता हूँ ॥"डॉ.मेघा देसाई और डॉ .विपुल देसाई दोनों बाल रोग विशेषज्ञ थे .आज डॉ. मेघा घर पर ही रहे .रामू के पास चाय और नाश्ता वहां पर ही मंगवा लिए .मेगेजिन के पन्ने पलटने लगे .अचानक उनके कदम शाश्वती के रूम की और बढ़ने लगे .शाश्वती ,उनकी इकलौती बेटी जो कल ही ब्याह कर बेंगलोर अपने ससुराल गई है .आज सुबह बेटा तन्मय कर्णावती एक्सप्रेस से मुम्बई और वहां से यू .एस .ऐ .जाने के लिए रवाना हुआ है ।

६ महीने पहले वे लोग इस 'शांतिवन' बंगले मैं रहने के लिए आए है .शहर से थोड़ा दूर तो है पर शांत और प्रदुषण से मुक्त वातावरण में है .डॉ .विपुल चाहते थे उनकी बेटी की शादी यहीं से हो .डॉ.मेघा कमरेमें पैर रखते ही माता मेघा बन गए .उनका मन कमरे की हर छोटी बड़ी चीजों के स्पर्श में शाश्वती को ढूँढने लगा .उन्होंने अलमारी खोली .शाश्वती के पहले जन्मदिन से अब तक के सारे उपहार ज्यों के त्यों सजाकर रखे हुए थे .दूसरी अलमारी में उसके कपडे . हलके रंगो के और सादगी परस्त कपडे .शाश्वती के टेबल के पास पहुँची .उनके हाथ में एक डायरी आई .शीर्षक था "कुछ अनकही ".बड़ी ही उत्सुकता से डॉ मेघा उसे पलटने लगी .शायद १०-११ साल की उम्र से उसने लिखना शुरू किया था .डॉ. मेघा खिड़की के पास बैठकर पढने लगी .शाश्वती ने हिन्दी और अंग्रेजी साहित्यमें एम् .ऐ. किया था ।"

आज मुझे बुखार आया था .मम्मा ने मुझे एक इंजेक्शन दिया .दवाई के तीन डोज़ तन्वी आंटी को समजा कर .ओरेंज ज्यूस देने का बोल दिया . मेरा माथा चूमा .और डार्लिंग सी यू कहकर हाथ हिलाकर तुम चली गई . तुम मेरे पास बैठकर मेरे सर को सहलाती ये आशा टूट गई .मैं तन्वी एंटी को पूछती की सबकी मम्मी तो ऐसे वक्त पर उनका कितना ख्याल रखती है तो मेरी मम्मी क्यों नही ? तो तन्वी आंटी कहती -मैं हूँ ना तुम्हारा ख्याल रखने के लिए !तुम्हारी मम्मी अगर अस्पताल नहीं जायेगी तो दूसरे बीमार बच्चों को दवा देकर ठीक कौन करेगा ?" मुझे संतोष तो नहीं होता पर मैं सो जाती ..."

डॉ मेघा के हाथ अब जल्दी पन्ने पलटने लगे ."एक दिन सामने वाली आंटी के वहां पर एक लड़की बेर खा रही थी और बिज फेंक रही थी .मुझे भी ऐसा करने की इच्छा हो गई .दूसरे दिन मैंने मम्मी के पर्स से एक रूपया निकाला.तन्वी आंटी ने ये देखा .मैंने बेर भी लिए . बाद में तन्वी आंटी ने मुझे बड़े प्यार से समजाया की मैंने कितना ग़लत काम किया है . मैंने उन्हें सच्चा प्रोमिस कर दिया की अब मैं ऐसा कुछ भी नहीं करुँगी ।"

डॉ मेघा सोचने लगी की जिन बच्चो की अच्छी परवरिश और संस्कार के लिए लोग उन्हें बधाई देते थे उसकी सच्ची हकदार तो तन्वीजी थी .वे उनके स्वर्गस्थ एकाउंटेंट हसमुख पटेल की विधवा पत्नी थी .उनकी ख़ुद की तो कोई संतान नहीं थी और उस वक्त चार साल के तन्मय और दो साल की शाश्वती के लिए उन्हें कोई विश्वस्नीय व्यक्ति की तलाश थी .दोनों की जरूरत पूर्ण हुई और तबसे तन्वीजी इस घर की सदस्य बन गई .अब डॉ मेघा के चेहरे पर उत्सुकता की जगह कुछ सलवटें ले रही थी .आगे के पृष्ठ पढ़ते हुए ....

"आज मैंने यौवन में प्रवेश किया .मम्मा ने सब समजाया तो था पर फ़िर भी मैंने उन्हें फोन किया ।"

बेटू !!मुझे अभी एक क्रिटिकल ओपरेशन के वक्त वहां पर रहना है .मुझे फोन मत करना ." कहकर तुमने फोन काट दिया .मुझे एकदम सदमा लगा .तन्वी आंटी ने मुझे अपनी गोदी में सुला दिया .तुम्हे कैसे समजा सकूंगी की मैंने तुम्हे उस दिन कितना मिस किया ?!!"

डॉ मेघा को अब महसूस हो रहा था की ऐसी कई बातें थी जिनसे आज तक वे अस्पृश्य ही रही थी .दो साल पहले जब तन्मय पढने के लिए अमेरिका गया तब वे दोनों अपने आप को बहुत ही धन्य मान रहे थे .पर रात को पढ़ते वक्त सो गए तन्मय को चादर से ढकना ,उसे कम्पनी देने रात भर रामायण लेकर पढ़ना ऐसी तन्वीजी की तपस्या भी इसमे शामिल ही थी .सुबह साढे नौ बजे से पेशंट -दवाई -ओपरेशन -कोंफरंस के बाद घर तो डॉ विपुल और डॉ मेघा के लिए सिर्फ़ रैन बसेरा ही बन गया था .सिर्फ़ रविवार को ही वे बच्चों के साथ रह पाते थे अगर पार्टी में जाना न हुआ तो ...पैसो की पारदर्शक दीवार के इस पार वे थे और दूसरी पार बच्चे .दोनों एक दूसरे को देख तो सकते थे पार महसूस नहीं कर सकते थे .दुनिया के हर एशो आराम के लिए ये बलिदान जरूरी भी था ना ?!!!!तन्मय के जाने के बाद शाश्वती बिल्कुल एकाकी हो गई थी .तन्वीजी कहती थी की जब ये बच्ची ससुराल चली जाए तो वे भी इधर से हरी द्वार चली जायेगी ।

अब पलटते पन्नों के साथ डॉ मेघा चौंकने भी लग गई ."आज मुझे देखने के लिए पापा के अमेरिका के दोस्त और उनका बेटा ध्रुव आए थे .ध्रुव अमेरिका में सर्जन था .मम्मा और पापा के हिसाब से मेरे लिए ये परफेक्ट मेच था .ध्रुव के हिसाब से अगर पति पत्नी दोनों काम करे तो बहुत ही अच्छा रहता है . बहुत महत्वकांक्षी लगा वह .....मम्मा ने मेरी इच्छा जाननी चाही .मैंने वक्त माँगा ।

उसी शाम हम एक पार्टी में गए .वहां पर मेरी मुलाकात निलयसे हो गई .वह ध्रुव के साथ ही आया था .बेंगलोर की एक आई टी कम्पनी में सी .ई .ओ .था .अगले साल प्रमोशन मिलने वाला है .बचपन में रोड एक्सीडेंट में माता पिता की मृत्यु हो चुकी थी .स्कोलरशिप पर ही पुरी पढ़ाई करी थी .हम दोनों को डांस में कोई दिलचस्पी नहीं थी . एक कोर्नर मैं बैठ कर दोनों कला साहित्य सामाजिक परिवेश की चर्चा में लग गए .शादी को एक मीठा बन्धन बताते हुए उसने कहा की शादी के बाद उसकी पत्नी अगर काम करे तो वह मना तो नहीं करेगा पार वह घर की देखभाल करे तो उसे ज्यादा पसंद होगा . और मुझे निलय पसंद आ गया .उस रात मुझे नींद नहीं आई .उसकी बातों में मुझे एक अजीब संतोष हुआ ।

मम्मा का काम करना मुझे कतई पसंद नहीं था .मैं उनके साथ रहने को तरस जाती थी .मुझे मेक डोनाल्ड के पिज्जा से ज्यादा उनके साथ की भूख रहती थी .इसी लिए मेडिकल के एंट्रेंस टेस्ट के आधे जवाब ही मैंने ग़लत लिखे क्योंकि मैं बड़े भइया की तरह डॉ बनना नहीं चाहती थी .निलय को बेंगलोर जाते वक्त मैंने हिम्मत करके पूछ ही लिया ," क्या तुम मेरे साथ जिन्दगी गुजारना पसंद करोगे ?" मैं जानती थी की वह भी मुझे प्यार करने लगा था पार भिन्न सामाजिक स्तर के कारण नहीं बता रहा था . वह चौंक तो गया पार उसने हाँ बोली ।

दूसरे दिन खाने के वक्त मैंने आप को अपनी पसंद बता दी .तन्वी आंटी को छोड़ सब चौंक गए .मुझे अपने सुखद भविष्य के बारे में समजाने के लिए आप दोनों दो दिन घर पर ही रहे पर मैं अपने निर्णय पर अटल रही ।

आख़िर कार आने अपनी मर्जी के ख़िलाफ़ मेरी पसंद पर अपनी अनुमति की मोहर लगा ही दी .मैं आप को कैसे समजा सकती हूँ की मम्मा एक बेटी की हैसियत से मैंने हमेशा आपसे जिसकी उम्मीद की पर आप कभी मुझे न दे पाई वह एक माँ की हैसियत से भविष्य में अपने संतान को मैं देना चाहती थी और वह था "समय "!!! और इसी लिए निलय मेरी पसंद था ....."अन्धकार अपना साम्राज्य फैला रहा था .डॉ महम्मद को लेकर डॉ विपुल घर लौट चुके थे .डॉ खान कह रहे थे ,"डॉ विपुल ,आपका घर बेहद सुंदर है .उसकी दीवारें बहुत ही मजबूत है ."डॉ मेघा को ये दीवारें आज खोखली महसूस हो रही थी .उन खोखली दीवारोंसे उठी हुई एक दर्द भरी टीस उनकी आंखों से अश्क बनकर डायरी के पन्ने पर बरस रही थी .......रेत घड़ी का ऊपर का हिस्सा खाली हो चुका था .....================================================================चार महीने के बाद ....डॉ मेघा कह रही थी - "विपुल!! सुबह शाश्वती का फोन आया था .वे दोनों चौदह तारीख को यहाँ पर आ रहे है . अरे हाँ !! दोनों जब तक यहाँ पर रहेंगे तब तक मैं अस्पताल नहीं आउंगी हाँ ...."माता मेघा की इस बात पर डॉ विपुल मुस्करा दिए ....

निरंतर बहती हुई नदी के किनारे की मैं हूँ रेत ,

सबको भिगाती हुई इस जल की धारा से मैं ही क्यों कोरी रह गई ??!!!



1 टिप्पणी:

  1. रेतघड़ी बहुत अच्छा लिखा गया है .
    गद्य में गीत कहूं तो ज्यादा ठीक रहेगा .
    सुंदर .

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