23 सितंबर 2011

वक्त

कारखानोंसे वक्त काला धुआं निकलता है ,
वक्त कभी भूखे बच्चेकी आहोंमे रोता है 
वक्त कभी सड़कके किनारे ठण्डमें ठिठुरता है 
वक्त का बदन कभी कड़ी धुपमें  जल जाता है 
वक्त कभी बूढी माँ की आहोंमें सिसकता है 
वक्त कभी प्यारकी आँखोंसे दर्द बनकर अश्क बन बहता है 
वक्त कभी मुडकर देखता नहीं पीछे 
देख भी लेता तो हर निशान नज़र आ जाते है जो उसने बनाये 
तो .....
वक्त कभी महबूबाकी मेहंदीका रंग बन खिलता है 
वक्त कभी दो दिलोंकी ख़ामोशीमें इश्कके सुर भी सुनता है 
वक्त कभी पढने जाता है युनिफोर्म पहनकर स्कुलमें 
वक्त कभी घोड़ी चढ़कर दुल्हन लेकर आता है 
वक्त हांफ जाता है पुराने अफसानों पर जवानी के हँसते हुए 
वक्त धुंधली आँखों पर चश्मा लगाकर दूर कुछ ताकता है ...
फिर भी 
ये वक्त ही है हर वक्त करवटें बदलता हुआ 
रुख जिंदगीके पलटता हुआ 
एक सिरे से चलता हुआ जब दुसरे छोर पर पहुँचता है 
तो एक नामकी शख्शियत के नाम जिंदगी की पहचान बन जाता है .....

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