१० फरवरी २०१०

प्यारा मौसम प्यार का ....

सरसराती हवाओं में प्यार की नमी है ,

गीली सिली ये हवाएं कुछ फुसफुसाती है कानोंमें ,

आ गया है फिर प्यार का मौसम ,

नयी गर्ल फ्रेंड को एक तोहफा देने का मौसम ...

पुरानी गर्लफ्रेंड को किया वादा तोड़ने का मौसम ....

लड़कियां यहाँ भी हमसे तेज ही निकली ...

डाकमें उसकी शादी है चौदह फरवरी को

इसकी निमंत्रण देती एक पत्रिका निकली .....

८ फरवरी २०१०

शुन्यवाकाश ...

आपने कभी खुदमें शुन्यवाकाश महसूस किया है ? किया होगा पर ये जो हमारी दौड़ती भागती जिंदगी है ना वो ये सोचने का वक्त नहीं देती ...या फिर उसे हम डिप्रेसन या फिर मूड ऑफ़ है कह देते है ....

कुछ करने मन ना हो ...सुबह में बिस्तर छोड़ने को मन ना हो ...कुछ काम करने को दिल ना करे ...दिमागमें कुछ ख्याल भी ना आये ...जाने सारे मंज़र थम गए हो ....बैठे तो बैठे रहे ...आसमां को तकते रहे ...नहीं नहीं जानती हूँ की प्यार का मौसम बड़े करीब है और ये निशानियाँ प्यार होने की निशानियों से बहुत मिलती झूलती है ...बट नो वे मैं प्यार की बात नहीं कर रही ......

जैसे काम करना , प्रवृतिमें मगन रहना , जीना -सांस लेना जैसे ही जरूरी है शुन्यवाकाश का होना ...तब जिंदगी रूकती है ...थमती है ... कोई नया ख्याल आता नहीं ...अगर आप कोई सर्जनात्मक क्षेत्रमें है तो आपकी ये शक्ति भी क्षीण होती नज़र आती है ...कोई नयी कहानी या कविता भी नहीं सूझती , अपने आपसे आप संतुष्ट नज़र नहीं आते ...पर कहते है की वक्त ठहरता नहीं है वैसे ये वक्त भी गुजर ही जाता है ...लेकिन ये वक्त हमारे भीतर को खाली कर देता है ..अपने पुराने विचारों को उसमेंसे निकाल के खाली करके साफ़ सफाई करने का ये वक्त है ...फिर नए विचार खुद ब खुद उसमें पनपने लगेंगे ...और एक नयी उर्जा आपमें संचारित हो जायेगी ...फिर नए विचार नए मूड से ये बदलाव से आप भी खुश रहोगे और आपके अपने भी .....

सच कहूँ तो इस ब्लॉग पर आने वाले भी महसूस कर रहे होंगे की अब मैं रोज पोस्ट नहीं लिख रही हूँ ...शायद मैं इसी दौर से गुजर रही हूँ ....कुछ भी लिख देना जिससे खुद को भी संतोष ना हो ..इस से बेहतर येही होगा की इस कलम को थोडा विराम दे दूँ .......खुद को जानने की ये चेष्टा है ..आज कल मैं पढ़ रही हूँ ...अखबारों की रद्दीमें से ज्ञानवर्धक विशिष्ट पूर्ति निकाल कर उसे पढ़ती हूँ ...वैसे आपको जानकार शायद आश्चर्य होगा की मैं वास्तविकतासे जुडी हकीकत पढने की शौक़ीन हूँ ...विज्ञानं की खोज के बारे में पढना अच्छा लगता है ...कल में लेनिन और माओ त्से तुंग के शव उनके देश में किस तरह सहेज के रखे गए है ...उसकी प्रक्रिया उसमे आई अड़चन ..उसके बारे में पढ़ रही थी ...और जब लिखती हूँ तब प्यार इश्क मोहब्बत की कल्पना उभरती है ....मेरी कल्पना जब खुद की जिंदगी की हकीकत में आमने सामने होती है उसका आनंद बयां नहीं हो सकता ...और ये सब मेरे शुन्यवाकाश की ही डेन है ...ऐसा लगता है कभी कभी की नयी दिशा को भी मेरी प्रतीक्षा है ...वहां से बेहतर फूल चुनकर ला सकूँ .....

६ फरवरी २०१०

फिर एस एम् एस की दुनियामें

दोस्तोंके लिए एक मेसेज :

कभी याद आये तो फोन करो ,यार !!!

पैसे कम हो तो एस एम् एस करो यार !!!

बिलकुल कड़के हो गए हो तो मिस कोल करो यार !!!!

और ये भी ना हो सके तो ....

मोबाइलको वायब्रेटर मोड़ पर रखकर दहीं में डाल दो

लस्सी बन जाएगी ,पीकर ऐश करो यार !!!!!

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इमरान हाश्मीका फ़िल्मी सफ़र :

इमरान हाश्मीने अपनी गर्लफ्रेंड को पहले "आशिक बनाया ",

फिर "चोकलेट " में " ज़हर " डालकर "मर्डर " कर डाला ...और कहा

"कलयुग "में "अक्सर " ऐसी ही "जन्नत " नसीब होती है .....

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फ्रेंड अंकलकी सूचि :

थ्री इडियट देखने के बाद अंकल और आंटियां अपने अपने दोस्त लोगों को ये मेसेज भेज रहे है :

शायद फिर से वो

तस्वीर मिल जाए ...

जीवनके सबसे हँसी

वो पल मिल जाए ...

चल ,फिर से बैठे

क्लास की लास्ट बेंच पर

शायद वापस अपने

पुराने दिन मिल जाए .......

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कोलेज का क्लास रूम ट्रेनके डब्बे जैसे ही होते है ....पहली दो बेंच रिजर्व कोच होते है , बिच की तीन से साथ बेंच जनरल कम्पार्टमेंट होते है ...और लास्ट दो बेंच वी आई पी लोगों के लिए स्लीपर कोच होते है ....

५ फरवरी २०१०

दो जू की दास्ताने मोहब्बत


वो निशाकी झुल्फोंमें था जादू ,
वो पूजाके लहराते बालोंकी थी कशिश ,
बस आशियाना बना था किसी का वो
बस एक प्यार की कमी थी ,
एक दिन निशाकी जुल्फोंसे ईशा नामकी जूने
मोबाइल किया पूजाकी जुल्फोंमें बसे साहिल को ....
है जो उसका पहला प्यार बना ...
हाल कैसा है जनाब का ?
दुजेने कहा क्या ख्याल है आपका ???
ईशाने कहा हम यहाँ पर ऐश फरमाते है ,
रात को टहलने भी जाते है ...
निशाके टकलू पतिके सर पर हम स्केटिंग करके आते है ...
ऐ सी में नींद भी जमकर आती है ...
घुंघराले लम्बे केश में खून की कमी कभी ना सताती है ....
साहिल तो गममें डूब डूब गया रोते हुए
कहने लगा ये हमारी मुलाकात आखरी है ....
मैंने पूजाकी बाथरूममें आज मेडिकरकी बोतल पाई है ...
हम कल रहे ना रहे तुम हमें याद कर लेना ...
आज पूजा शायद ब्यूटी पार्लर जायेगी हेर कट करवाने को
हम वहां कोई नया घर ढूँढेगे कंगे में जमकर ...
बड़े अच्छे दिन मुझे बहुत याद आयेंगे
जब हमें खुशबू वाले तेल मदहोश कर जाते थे ,
वो क्रीमके भी थे जलवे और बादामका तेल पुष्ट बनाने को ...
ईशा तब बोली बस मैं तो जूठी बातों से दिल बहलाती हूँ ...
चमेली तेलकी गंधसे मैं यूँ ही मर जाती हूँ ...
तब एक लिखिए ने (जू निकालने वाली बारीक कंगी )ईशा के सर पर किया वार ...
नेट वर्क टूट गया और एक प्रेम कहानी का करुणांत हो गया ....

४ फरवरी २०१०

सैर सपाटा ....

बहुत बोल चुके अब एक चुप्पीसे वफाएं करनी है ,

उदासीके पल जी लिए ग़मोंके चादरमें लिपटे ,

अब खुशियोंसे यारी करनी है ,

कहते है छुपी है है वह दो पलोंके बीच पूल पर ...

क्या करें ? बन्दरकी तरह कई पलों पर छलांग लगाकर

कूदने फांदने की आदतसी हो चली है ,

जल्दी पहुंचना है मंजिल पर हमें

जिसके पतेकी चिठ्ठी तो हमसे गूम हुई है ....

चलो अब ख़ामोशीसे दोस्ती कर ली

नज़रें कुछ और चौकन्नी कर ली ....

चलती है जहाँ भेडचालमें एक भीड़

हमने बस पगडंडियोंसे यारी कर ली ....

रास्तेंमें खुशियाँ मिलती रही ....!!!!!!!!!!!!!

कभी कोयल की कूक बनकर ,कभी रेंगते सांप सी ,

कभी हाथी की दूम सी , कभी शेरकी दहाड़ सी ...

चलो हम अब हाथ में हाथ लेकर एक सैर को चलें .......

२ फरवरी २०१०

मेरा मेहमान ...

कभी मन करता है बस ,

कम्बलमें लिपट कर आँखें यूँ मीच ले जैसे सुबह हुई ही नहीं ....

नींद भी आ गयी ...फिर एक के बाद एक आवाज आने लगी

शोर का नकाब ओढ़कर ...ठण्ड की सिरहनसे ये नहीं कांपती ...

बस अपने वजूद को दिखा देने का मौका कब मिले

येही दिन भर भांपती रहती है ....

बस शोर के बीच कभी बुलबुल चहक उठी

मेरे घर में भूल से आ गयी थी ...

इस मेहमान को मिलने मैं भी दीवानी बेतहाशा दौड़ पड़ी ....

बस एक छोटा सा मुखड़ा गाकर वो भी वहांसे चल पड़ी ....

बहुत शोर था ...कोहराम था ...पर ....

पर ....

एक कशिश थी उस बुलबुल के गानेमें

जो मुझे बरबस उसका वजूद जताकर गयी ...

अभी भी इंतज़ार है ....उसका ...बुलबुल का ....

३१ जनवरी २०१०

चलो एक कार लें .....

कल टीवी देखते हुए एक नयी कार का इश्तिहार आया ...मेरी एक सहेलीने कहा ये अच्छी कार है ...सस्ती भी है ...ले लेनी चाहिए ..मैं उसका चेहरा देखने लगी .....क्यों ????

पता है मेरा घर बहुत सादगीसे सजा है ...उतना सब कुछ है जो सुकूनसे लिए जरूरी है ...इस लिए मुझे उसका सुजाव कुछ अनमना सा लगा ...

मैंने कहा अगर स्कूटर पर जाये तो मेरी ससुराल सिर्फ १५ मिनटमें पहुँच सकते है ...और मायके जाना होतो पच्चीस मिनट काफी है ...उस पर रोड पर प्रतिदिन बढ़ रहा ट्राफिक देखो ...अगर कार होती है तो हमें कितनी देर ट्राफिकजाममें फंस जाना पड़ता है पर ये छोटा सा स्कूटर एक चूहे की तरह छोटी गली से निकल कर शोर्टकटसे हमारी गति को रोकता नहीं ...जहाँ पर हमें जाना हो वहां से कहीं दूर कार पार्क करो और फिर बाज़ार जाकर सामान खरीदो ....तुम्हे नहीं लगता कार कुछ कमाल नहीं कर पाती ऐसे हालमें ...और अगर दुसरे शहर जाना हो तो कुछ रुपये प्रति लीटरसे टेक्सी मिल जाती है ...तो ये सफ़ेद हाथी मैं क्यों पालू ??ऊपर से जंगल की आगसे बढ़ते हुए पेट्रोल के दाम !!!!! बेंकसे लोन लेकर इसे ले तो ले पर फिर किश्तें चुकाते हमारे रोजमर्रा के कितने खर्चे पर कहाँ पर कटौती कर पाएंगे ???? अब तीन चार साल के बाद बेटी का ब्याह करना हो तो ये रकम काम आ सकती है ...

बस आज ऐसे सोचो की हमारी जरूरतकी ना हो पर शान के लिए कर्ज लेकर ये चीजें हम ख़ुशी ख़ुशी बसा लेते है उसकी सचमुच व्यवहारमें अहमियत है ????

ये सब बातोंसे मुझे एक फायदा जबरदस्त हुआ की हमें रात को सोते वक्त नींद की गोली नहीं लेनी पड़ती ...चैन और सुकून की नींद तुरंत आ ही जाती है .....

निष्कर्ष : दूसरोको देखकर नहीं पर अपनी जरूरत देखकर चलते है तो हम कई मुश्किलों से बच सकते है ....