24 अप्रैल 2015

खुद को समजाना है ....

अहसासों पर करम का ये फ़साना था  ,
शायद मेरी कलम का वो जनाजा था   …
तेरे दर पर जाकर हर सदा लौट चुकी थी जब  ,
तेरे आने की आहट का फकत भरम सा था  …
आज जाकर देखा तो दिल विल प्यार वार
एक जमाना गुजर गया था उस गलीमें गए  …
न प्यार का दीदार हुआ  , न दिलका दरद  ,
कहती रहती है प्यार जिसे वो न दिखा है
कभी लगा है वो तो है जीने की वजह या भरम ????
क्यों आज मायूसी छायी है हर तरफ ,धुंधलाती गर्द सी ??
खुद की चिता की राख से उठकर खड़ा होना है अब  ,
प्यार की दुनिया के उस पर भी
जहाँ और भी है ये खुद को समजाना है  .... 

15 फ़रवरी 2015

कहीं से गुजरती थी

कहीं से गुजरती  थी एक डगर ,
जो तेरे दर से होकर जाती थी  ,
ये किस्मतकी लकीरें जैसी थी  ,
जो मंज़िल सामने आते ही पलट जाती थी   ....
तेरा ख़याल न छोड़ा हमने कभी  ,
तेरा दीदार  न किया हमने कभी  ,
तेरे से सहर होती रही इस शहरमें  ,
पर तेरा जिक्र न किया हमने कभी  …
न कसम थी न किया कोई वादा  ,
बस ये ख्यालोंमें पका था इश्क़ कभी  ,
तेरे दिलको न टटोला था कभी  ,
बिना कुछ शर्त कोई वादा खुद से किया कभी  ....
मेरा इश्क़ मुकम्मिल है  ,
गर दुनिया न करे कुबूल इसे  ,
फिर भी हमें उस पर रश्क है  ,
रब का दीदार न किया कभी हमने
फिर भी दुआओमें तू कुबूल है  .... 

24 नवंबर 2014

मुद्दतें हो गई

मुद्दतें हो गई कल रात  जहनमें तेरा नाम याद आया  ,
तुझे भेजा था खत लिख कर  पैगाम याद आया  …
तुम्हारे और मेरे बीच यादोंमे भी दूरिया हो गयी अब ,
कहाँ से चले थे कहाँ पहुंचे है हम वो वक्त गुजरा याद आया  …
आज कोई और है मेरे पास  ,
आज कोई है मेरा खास  .
तेरी याद भुलाने के लिए वो खुद को भी भूल गया  ,
उसने किया जिक्र तुम्हारा इसी लिए तू याद आया  …
क्या कहूँ इसे तुम्हारी मज़बूरी या बेवफाई ,
तुम्हारी यादो में कभी वो एहसास न आया  …
मज़बूरी कभी बेवफाई करने को मजबूर कर देती होगी  ,
लो आज पता चला और ये इल्ज़ाम मिटाने का काम याद आया  …

15 नवंबर 2014

इल्तज़ा

आज फिर वो ही बात है ,
बस तुम्हे याद दिलानी है  .
मौसमने ली अंगड़ाई है ,
बस तुम्हे फिर भीगना है  …
वो सड़कें फिर भीगी एक बार  ,
बस तुम्हे उस पर चलना है  ,
हर किवाड़ पर दस्तक दे चुके हम ,
बस तुम्हारे दिल की किवाड़ को खोजना है  .
तुम्हारी याददाश्त कमजोर हो गयी है अब  ,
बस उसे एक बार फिर दोहराना है   रिश्ते को …
तुम्हे तो हर निवाले पर याद करते है हम  ,
तुम्हे वो ज़ुर्रियां वाले हाथ महसूस करवाना है  .
खुश रहो आबाद रहो जहाँ नयी दुनिया है तेरी  ,
बस आखरी सांस पर इस बेबस माँ को  ,
तुम्हारे कंधे पर चढ़ कर जाना है  ……

7 नवंबर 2014

माँ का पल्लू

वो उभरती धुएं की लकीर उठती हुई
चाय के कुल्हड़ से गर्माती हथेली को  ,
ये  सर्द सुबहें होती है शॉल को लपेटे हुए ,
वो स्कूली बचपन याद आ जाता है  …
स्वेटर में बनी हुई माँ की  ममता की उन
गरमाहट बनकर लिपटी हुई उसकी गोद सी  ,
वो बेर ,जामफल को खाना नमक डालकर  ,
वो गुलाबी रंगकी बहती नाक और खो जाता रुमाल  ……
वो धुप सेंकती दादी उसके नाक पर का चश्मा  ,
वो बादाम का हलवा और गोंदकी बर्फी  ,
 रजाईको लपेटे घुस कर सोना बिस्तरमे ,
और बंध दरवाजे से उड़कर आती सपनेमे परियाँ  .......
बस यूँही  याद आ गया फिर जब मुन्नू को उठाने गए  ,
उसने दस मिनट कहकर फिर रजाइमे सर छुपा लिया ,
बेटे से बाप होने की ये यात्रा में पीछे छूटी याद का दामन ,
बस माँ का पल्लू  आँखों से बरस गया  …

29 अक्तूबर 2014

न तुम हो न हम है …

हथेली पर से फूंकसे उडी गर्द सी ,
वो यादें बह चली हवा के साथ ,
हमें लगा वो राख थी अरमानोंकी ,
लेकिन रातके साये में जुगनू सी चमक लिए थी  ....
कागज़से उठते हुए शब्द शबनमसे उड़ जाते है  ,
तुम्हारी फुरकत की आग की जलन से  …
वो बिखरे हुए लम्हात ,उड़ती हुई यादें  ,
नीमकी टहनी पर जुले पर गाती हुई  ,
शामके सन्नाटे में गूंजती हंसी तुम्हारी ,
सब तरोताज़ा है वहां पर  …
बस वहां न तुम हो न हम है  …

23 अक्तूबर 2014


दीपावली के त्यौहार की सबको हार्दिक शुभकामनाएं  .  
आने वाला नववर्ष सबके लिए मंगलमय हो  …… 

11 अक्तूबर 2014

थिरकती है साँसे

थिरकती है साँसे बस एक आहट के आने पर ,
एक बूँद गिर गयी ओस की बस आँख से गालों पर ,
सिरहाने पर सपने सोये थे जागे से कुछ सोये से ,
उस आहट पर करवट बदली उन सपनोंने भी ,
यादों की चद्दर पर कुछ सिलवटें लिख गए  ....
सिलवटोंमें से सिमटे निकले वो गुजरे ज़माने ,
एक सफा कुछ पीला पीला कुछ कोरे कोरे अफ़साने ,
यादों की धूपमें कुछ नज़रको भी सुखा दिया ,
बिन ऐनक भी पीले सफों पर ताज़ा इश्क़ सहला दिया ,
कसम नहीं तोड़ी कभी आमना सामना न होने दिया ,
ये ज़ुर्म तुम्हें नहीं पता की तेरी यादोंमें बसाया जो शहर ,
उसके हर पौधेको खून से सींच कर हमने
उस शहर के गली कुंचो को हमने वीराना न होने दिया  … 

6 अक्तूबर 2014

आहट

ये शायद कोई तिनके के गिरने की आहट है ,
ये तिनका पंछीके पंख सा हल्का है ,
इस सन्नाटे में उसकी आवाज भी आती है  …
इतना सन्नाटा है भीतरकी गली में ,
जिसका नाम है पता है पर वहां मैं रहता नहीं  ....
बेख़ौफ़ होकर घूमता रहता हूँ वीराने में ,
कोई डर नहीं बियाबान जंगलमें ,
रेगिस्तान की तपती हुई बालू
न जला सकी कभी मेरे नंगे पैरों को भी  ....
बस क्या वजह है मेरे कमरे के उस कोने में ,
एक आयना पड़ा हुआ है सालोंसे ,
उस पर गर्दको पोछता हूँ हर रोज़ सुबह ,
फिर भी खुदके अक्सको देखने से डरता हूँ में  … 

4 अक्तूबर 2014

उम्रकी देहलीज पर

दिन महीने साल
सरकते है रेतघड़ी से ,
जैसे वक्त फिसल रहा है मुठ्ठीसे ,
चिकनी सी चाहते मुठ्ठी पर मलकर
चाहा की वक्त थोड़ी देर चिपक जाए वहीँ पर ,
पर ये तो वक्त है ,
हर बन्धनसे मुक्त होकर फिसलता रहता ,
हर वक्त चेहरे पर एक लकीर छोड़ जाता है ,
अपने निशां यादोँ में छोड़ जाता है ,
तस्वीरों का एक पूरा आल्बम है कैद ,
वो सब कुछ छोड़कर हमारे पास ,
एक जोगीसा बनकर
घडीका संसार छोड़ जाता है ,
वक्त हमें भुलाता  है ,
वक्त हमें याद कराता है ,
हमें उम्रकी देहलीज पर छोड़कर ,
वो तो सदाबहार बन जाता है  …