27 फरवरी 2012

महेफिल ए हाइकु ....

चाँदका मोम
पिघलता रहेगा
आज रातमें ....
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कोई निशानी
नज़र नहीं आती
फिर भी तू है .....
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न ही ज़ख्मको
कुरेदा कीजिये यूँ
लहू रिसेगा ....
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इंतज़ारकी
घड़ियोंसे गुजारा
वक्त शबका.......
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विरासत है
या है ये रिवायत ?
अदा ए हुस्न !!!!!!!
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खयालोंमें ये
चलते है  गुब्बार
तस्वीर बन ....
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तेरे दरकी
राहोंमें न थकन
ए मेरे यार .......


26 फरवरी 2012

अब जीना रास आएगा फिरसे ....

चलो चलो कहीं दूर भाग चलते है ,
भागते भागते रुकी जब सांस -
 तो देखा 
इंसानोकी बस्ती दूर कहीं पीछे छुट रही थी ,
घने तने लिए ये दरख्त सदियोंसे
अपनी जगह रोककर खड़े थे ,
उनके शाखें और पत्तियां फ़ैल जाते
सूख जाते या टूट जाते ,
फूल खिलते या फल बनते ,
उन पर कभी घरौंदे बनते या पंछी चहकते
कोई मौसमका उनपर कोई फर्क नहीं ,
वो तो बस ध्यानस्थ योगी की तरह
अपनी जगह पर खड़े हुए ,
न आंधी न तूफान ,न धूप न बरसात ,
न कड़ाकेकी ठण्ड न बहारों-पतज़दका मौसम ...
क्या फर्क पड़ता है इन संन्यासियोंको ???
हाँ ये तो हमें खुद तय करना है कि:
कि हमें किन बातोंसे फर्क पड़ना चाहिए !!!
और हम लौट चले इंसानों की बस्तीमे 
फिर से पर एक सोच साथथी ...
वही दरख्तोंवाली !!!! अब जीना रास आएगा फिरसे ....

25 फरवरी 2012

एक परिंदा...

एक घरकी छत पर बैठा था एक परिंदा ,
थोडा सा सहमा थोडा सा  घबराकर ,
बस थोड़ी देर बाद वो फिर उड़ने चला
और सामनेके पेड़ पर बैठ गया ......
बस भय की एक लहर होती है तेज धड़कन
वो जब सामान्य सी हो जाय तो
उड़ान फिर शुरू करो ...
बस ये बात हम समजदार इंसान नहीं समज पाए
आज तक ..अभी तक ...
क्यों सर पटककर रोते है
बंद दरवाजोकी किवाड़ोंसे ....
जब मंजिलें और भी होती है
इस राहसे पलटकर !!!!!!

24 फरवरी 2012

इश्कके नाम

इश्कसे बड़ी कोई इबादत नहीं
फिर भी इश्ककी हमें इज़ाज़त नहीं ....
नजरोंसे तारीफोंके कसीदे पढनेवाले
तुझे इज़हारे प्यार करने की इजाजत नहीं .....
ये कैसा इश्क है ????
इश्क : इबादत जिसे कहते है खुदाकी विरासत ,
जिसे मायने समजमें नहीं आते इश्कके कभी ,
उसके नाम ये रूहानी जायदाद लिख दी है ज़मानेने ,
इश्क हारा है हरदम ज़मानेको जुल्मोंसितमसे
पर भूल गया जमाना उन शख्शियतोंको
जिसने खिलाफत की इश्ककी ....
याद अभी भी किये जाते है उन नाकाम अफसानोंको
जो इश्कके नाम फ़ना हो चुके .....

23 फरवरी 2012

कोरी कोरी ख़ामोशी ...

वो कोरी कोरी ख़ामोशी ,
धुली हुई साफ़ चांदनीसे ,
सुखा  रही थी रातकी झुल्फें
बुँदे सितारे बनकर बिखरती गयी ........
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कभी रातको देखा है करवट बदलकर इंतज़ार करते हुए ?
आँखोंमें तराश देती ही ये जलवा एक लालिमाको लिए ...
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तुम्हे ढूंढते रहना हर गली हर शहर ये आदतसी बन गयी है ,
क्योंकि हवाएं कहाँ दिख पाती है वो तो बहती रहती है एक रुख लिए .....

22 फरवरी 2012

शरारती कहींकी !!!

आज हवाके साथ उड़कर
एक सफा घरमे उड़कर आया ,
ये तो नज़्मकी आधी कहानी लगी ,
पूरी होगी जिस पर उस सफेकी कोई निशानी नहीं !!!!!!
इस आधी अधूरी नज़्ममें चलो जोड़े जाए ,
कुछ और शब्द अपने लिफाफोंसे ,
जैसे कागज़के आयने पर कुछ अक्स नाच रहे हो !!!
आयनेमें कुछ सजाते खुद पर
आँखोंमें काजलसे ,पैरोंमें पायल से ,हाथोमें चूड़ियोंसे
और माथे पर कुमकुम की तरह सजे सजे से ......
तब लगा ये नज़्म भी एक औरतका रूप लेकर आती है ,
तैयार होनेमें भी कितना वक्त लगाती है ...
लेकिन जब सज संवर कर निकलती है
इस कलमसे स्याहीमें बहती हुई ,
तो कागज़की कोरी कोरी वीरानीसी जिंदगीमें
जैसे एहसासोंकी खुशबूमें लिपट कर बहार आती है ...
हैं ना..!! है ना  !!!है ना  !!!
अरे कहो ना कैसी लग रही हूँ
ये इतराकर पूछती हुई नज़्म !!!! शरारती कहींकी !!!

21 फरवरी 2012

फिर कोई रोशनीसे दामन भर गया


एक दिन बुरा सपना बनकर आता है ,
तो रातको फिर कोई ख्वाबोंको टटोलता है ...
ख्वाब कहते है दिनको भूल जा बुरे ख्वाबकी तरह ,
चल मैं जीना सिखा दूँ तुझे एक हकीकत बनकर .....
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मायूसीके घेरे भी कभी बनते है करीबीका कारण,
कोई तब  आकर पूछता है कैसा है दोस्त हाल तेरा ????
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यारी निभानेके लिए कोई वादा जरुरी नहीं ,
हो सके तो यारके लिए जीनेकी वजह बनकर देखो .......
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एक छंटता हुआ बादल पीछेसे सूरज छोड़ गया ,
देखो अँधेरेको चीरकर फिर कोई रोशनीसे दामन भर गया .....

20 फरवरी 2012

चुभ गया दिलमें ....

निठ्ठ्लापन जिंदगीका चुभ गया दिलमें
वीरानेमें फिर कभी बहार न आएगी मुड़कर शायद ....
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मेरी खामोशीको कमजोरी समजकर 
हर कोई मेरा हौसला तोड़ता  चला गया .....
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मंजिलोंको मेरी जरुरत नहीं है शायद
उसे मिल गए है चाहनेवाले बहुतसे अभी ......
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गर कोई मकसद न रहे जीनेका
तो ये जिंदगीका क्या करना ???
जिसने दी है ये अनमोल सौगात कहकर
उसने ही तोड़ दिया उसे जर्रे जर्रेमें कांचकी किरचोंमें ...

19 फरवरी 2012

न मेरा निशान कहीं कोई..

आज दो दिनोंसे नि:शब्दसी मैं ,
ख्यालोंके बवंडरमें उल्ज़ीसी मैं ,
दिल   और दिमागके युध्धमें हारी सी मैं ....
ये कुछ अलग अलगसी मैं ......
न वजह है न कोई गिला न शिकवा किसीसे ,
बस कर्म है सिध्धांतसे रूठा कहीं पर ,
एक द्वंद्व लिए दिल और दिमागके बीच का ,
एक समाधानको ढूंढती हुई सी मैं .......
एक डर है जिसकी वजह भी नहीं कोई ,
एक निराशासी लगी है जहाँ हारका नहीं नामोनिशां कोई ,
भरी भीड़के शहरमें मुझे तनहासा छोड़ दिया गया है ,
और उस भीड़में अपनेकी तलाश करती हुई सी मैं .....
खाली खाली हिलते हुए परदे
फिर भी  हवाका न हो वजूद कोई ,
कोई जैसे देहलीज पर आकर मुड जाता है मेरी ,
उसे फिरसे पुकारने की कोशिशसी मैं .....
न कोई तलाश हो ,
न कोई कारवां हो ,
न कहीं मेरा नाम हो ,
न मेरा निशान कहीं कोई ,
फिर भी हर जगह दिखती हुई निशानीसी  मैं ....

18 फरवरी 2012

उई माँ ..........

आज चुप चुपसी एक सुबह हुई ,
सूरज भी दबे पांव आया ,
रात हाथमे रेतकी तरह सरक गयी ,
और नींदने अपना दामन कुछ ज्यादा फैलाया .....
आँखे खुली तो उजालेका दुशाला ओढ़े
एक सुबह हंस रही थी ...
मुझे पूछ रही थी ...
क्यों आज कुछ खास सपना था ??
या फिर
सपनेमें मिल गया कोई अपना था ???
मैंने मुस्कुराकर बिस्तरका पहलु छोड़ा
और फिर आँखे नचाकर उसको बोला :
मेरे सपनोकी गलीसे गुजरकर
मैं अपने बचपनमें पहुँच गयी थी
और वही पुराने यारो दोस्तोंसे मुलाकात हो गयी थी ...
सर पर लग गयी चोट गुल्ली डंडा खेलते हुए ,
तो डॉक्टर साहबसे पट्टी करवाने गए थे
सब यार दोस्त मेरे इर्द गिर्द खड़े थे ...
डॉक्टरने जब सुई लगायी तो जोरसे मैं चिल्लाई .........
उई माँ ...........................
आँखे खुली तो वो सपना था खुबसूरत
जिसे मैं रातोंके नींदके दोशालेके हवाले छोड़ आई थी ...