4 अप्रैल 2014

ये उम्मीद तो नहीं

बहुत नज़दीक थे
एक तुम थे एक हम थे ,
बस वही करीबी हौसला थी ,
ये कभी भी फ़ासलेमे तबदील न होगी  …
बस शायद मशरूफ होते चले गये ,
शायद तुम्हारे वजूद को भूलते चले गए ,
बस अपनी राह पर बढ़ते चले गए ,
रुके तो तुम साथ न थे  …
याद आये वो एक एक लम्हे वादों के ,
पर साथ और हाथ छूटा वो पता न चला ,
न तुम हरजाई हो ,न हम बेवफ़ा !!!
फिर ये दूरियाँ ????
बस वापस आ रहे है ,
लौट रहे है वहाँ पर ,
शायद तुम  लौटो ये उम्मीद तो नहीं ,
फिर भी तुम्हारा इंतज़ार करने को मन करता है  …!!!!

31 जनवरी 2014

कोहरा

कुछ कहने की कोशिश का कोहरा ,
शब्द निशब्द ,ख़ामोशी का मोहरा ,
कलमकी छटपटाहट मेज पर ,
स्याही का भी विद्रोह कलमसे  ....
ख्यालोंकी  महेफिल सजती है अब ,
सिर्फ ख्यालोंसे उभरते है जहन जब ,
ये ख़ामोशी ये चुप्पी से है दोस्ताना ,
सामने हो कर भी अनजान से रहो ,
ये तेरे मेरे प्यार का वास्ता  …
कोई था कोई है कोई रहेगा ,
शायद ये कोई एक भी हो ,
या फिर ये कोई तीन रुपमे मिले ,
ये कोहरा जो तस्वीर को धुंधला कर उड़ चला  .... 

23 जनवरी 2014

वो कोहरे वाली हँसी …

बस ठण्ड से ठिठुरती वो चुभती हवाएं ,
कांच की खिड़की पर अंदर जमती भाप ,
उस पर दिल का आकार बनाकर
नीचे नाम लिखना आपका ,
वो दूर दूर कोहरे बादलों पर ,
उभर रही वो तुम्हारी तस्वीर ,
हाथ में गरमागरम कोफी का मग ,
उसे दोनों हथेलियोंसे कसकर पकड़ना ,
उसकी गरमाहट महसूस करना
जैसे तुम्हारा हो साथ ,
वो अलसाती हुई सुबहमें
अंगड़ाई लेती है जाड़े एक नरम नरम सुबह  …
मैं और मेरी तन्हाई और वो कोहरे वाली हँसी  … 

11 जनवरी 2014

अक्स ????

रात कुछ गिरने की आहट हुई ,
मोमबत्ती की रौशनी कर देखा
एक लम्हा गिरा था ,
उठाकर देखा तो
मेरा गुजरा हुआ वक्त था ,
मुस्कुरा रहा था ,
छटपटा रहा था ,
आखें नम थी ,
होठों पर मुस्कराहट  … फिर भी ,
मैं इस सब से दूर खड़ी ,
वक्त की नदीके दूसरे किनारे पर  …
वक्त हर लम्हे से अलग खड़ा ,
अपनी रफ़्तार में दौड़ता ,रुकता ,
सुस्ताता दिखा  … पर वो रफ़्तार मेरी थी  …
क्या वक्त मेरी परछाई था ????
या फिर मैं गुजरते वक्त का अक्स ????

25 दिसंबर 2013

एक नायाब सा पल

एक नायाब सा पल बैठ जाता है सिरहाने पर ,
मैं सपना समजकर फिर से आँखे मूंद लेती हूँ  ....
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इश्क़ के रंग को ढूंढ रही थी हर रूप में ,
पर वो था पानी के रंग का हवा सा घुला  …
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बदरंग बदहवास नहीं होती है जिंदगी कभी ,
वो हमारी बदगुमानी और बदनियत का आयना बन जाती है कभी कभी  …
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हर वक्त मिल जाते है दोराहे हमें जिंदगी में ,
बस वो हम ही होते है सहूलियत के हिसाबसे चल देते है  ,
वो दो राह दिल और दिमाग की जंग होती है ,
दिल सोचता है अच्छी मंजिल और दिमाग चुनता है सरल राह !!!!!!

9 दिसंबर 2013

रूठी हुई महबूबा सी

रूठी हुई महबूबा सी ये शाम बैठी है खिड़की पर ,
कुछ धुँधली सी याद के परदे लगाकर पलकों पर ,
सामने बैठी हुई चिड़िया की चहचहाट की डूबती हुई आवाज ,
बस तन्हाई के आगाज़ की नईनवेली नज़्म लिखने बैठी है  ....
इस रात भी आएगा चाँद थोड़ी ठंडक लिए पहलु में ,
रात से इश्क़ महोब्बत के किस्से दोहराएगा फिर से ,
बस ये आँखे कुछ भी न सुनेगी या पढ़ेगी चाँद पर लिखा हुआ ,
बस सिर्फ नाम पढ़ती रहेगी अनलिखा सा तुम्हारा  ,
जो लिखा जाता था हर सांस की कलमसे सितारोंकी तश्तरी पर  …

18 नवंबर 2013

एक औरत


रोज रोज हर दिन टूट कर बिखेर देता है ,
हर सुबह फिर सिमट कर खड़ी होती हूँ  …
लेकिन भीतर ही भीतर दरारें बनती रहती है  ,
लगता है जुड़ती हूँ फिर टूटती रहती हूँ  …
जो कल तक साथ थे अब सामने आकर खड़े रहते है ,
कल तक सामना दुनिया का करना था
आज अपनों का करना है ,कुरुक्षेत्रका अर्जुन बन गयी हूँ ,
अपने वजूद के लिए ये संघर्ष है मेरा ,
मेरी जिंदगी पर मेरा भी कुछ हक़ है ,
मेरा भी कुछ अधिकार है सब के पास ,
मैं माँ ,बेटी बीवी के अलावा एक इंसान भी हूँ ,
हर तरकीब पता है ,हर कानून भी जानती हूँ ,
पर जिंदगी एक किताब या लड़ाई तो नहीं ,
हर दिन एक औरत एक माँ के आगे हार जाती है  ....
सबने आकर मेरे पास अपना अपना हिस्सा ले लिया ,
ये खाली कफ़न को लिए कंधे पर ,
सूखे पत्ते कि तरह उड़ती फिरती हूँ  …
पता नहीं कब तक  .... कहाँ तक ??????
मेरी मुस्कराहट के पीछे के सन्नाटे को सिर्फ मैं महसूस करती हूँ  ...

15 नवंबर 2013

वक्त नामकी नदी

वक्त नामकी नदी  किनारे खड़े है हम ,
और दिल बह रहा है धारा में ,
खामोश खड़े हम देखते रहे।
चुपचाप खड़े किनारो को नि:शब्द  ………
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एक जिंदगी में कितनी जिंदगी जीते है ,
कितने रिश्तों के चोले बदलते है हम ????
एक साथ इतना उठाकर चल देते है बेखबर ,
खुद के अस्तित्व को इसमें दफन करते है लोग  ……
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कुछ मौत ऐसी भी होती है दुनिया में ,
नब्ज़ चलती है ,दिलकी धड़कन भी ठीक ,
बस रूह को कतरे कतरे काट दिया जाता है ,
और बेजान रूह कैद रहती है उस जिस्ममें  …… 

12 नवंबर 2013

बस फिर वही

बस यूँही गुस्ताखियां ,
बस फिर वही शोखियां ,
बस फिर वही शरारतें ,
बस फिर वही दिन की अंगड़ाइयाँ ,
बस फिर वही रात भर साथ चलती तन्हाइयाँ ,
बस फिर वही नदी की बालू पर पैरों के निशाँ ,
बस फिर वही बिना बात मुस्कुरा देना ,
बस फिर वही अनायास पलकें भीग जाना ,
बस फिर वही खिड़की से आसमानों पर तकना ,
बस फिर वही किवाड़ पर दस्तक होने का भ्रम ,
बस फिर वही रातोंमें सितारों को एकटूक तकना ,
बस फिर वही गली के नुक्कड़ तक जाकर मुड़ जाना ,
ये सारे काफिले गुजरते है बस तेरी याद की गलियोंसे   ....... !!!!!!

11 नवंबर 2013

एक एक पल

एक एक पल करके अपने  दामनमें
समेट कर पुरे साल को वक्त ले चला  …
मेरे जीवनमें कुछ खुशियां कुछ गम देकर चला गया  …
क्या सोचु बैठकर में ???
मेरे घाव को भरने के मरहमसे बेमुर्रावत
एक नासूर बनाकर चला गया  ....
जीवनमें जोड़कर चलता रहा उन लम्होंको ,
जैसे खुशियों को निचोड़कर गमके निशाँ छोड़ता चला गया  …
नाउम्मीदी कैसे करे हम ???
अभी रात का आखरी पहर है यहाँ ,
सूरजके उजालेमें रातका लम्हा छटपटाता चला गया   .......