11 अक्टूबर 2014

थिरकती है साँसे

थिरकती है साँसे बस एक आहट के आने पर ,
एक बूँद गिर गयी ओस की बस आँख से गालों पर ,
सिरहाने पर सपने सोये थे जागे से कुछ सोये से ,
उस आहट पर करवट बदली उन सपनोंने भी ,
यादों की चद्दर पर कुछ सिलवटें लिख गए  ....
सिलवटोंमें से सिमटे निकले वो गुजरे ज़माने ,
एक सफा कुछ पीला पीला कुछ कोरे कोरे अफ़साने ,
यादों की धूपमें कुछ नज़रको भी सुखा दिया ,
बिन ऐनक भी पीले सफों पर ताज़ा इश्क़ सहला दिया ,
कसम नहीं तोड़ी कभी आमना सामना न होने दिया ,
ये ज़ुर्म तुम्हें नहीं पता की तेरी यादोंमें बसाया जो शहर ,
उसके हर पौधेको खून से सींच कर हमने
उस शहर के गली कुंचो को हमने वीराना न होने दिया  … 

6 अक्टूबर 2014

आहट

ये शायद कोई तिनके के गिरने की आहट है ,
ये तिनका पंछीके पंख सा हल्का है ,
इस सन्नाटे में उसकी आवाज भी आती है  …
इतना सन्नाटा है भीतरकी गली में ,
जिसका नाम है पता है पर वहां मैं रहता नहीं  ....
बेख़ौफ़ होकर घूमता रहता हूँ वीराने में ,
कोई डर नहीं बियाबान जंगलमें ,
रेगिस्तान की तपती हुई बालू
न जला सकी कभी मेरे नंगे पैरों को भी  ....
बस क्या वजह है मेरे कमरे के उस कोने में ,
एक आयना पड़ा हुआ है सालोंसे ,
उस पर गर्दको पोछता हूँ हर रोज़ सुबह ,
फिर भी खुदके अक्सको देखने से डरता हूँ में  … 

4 अक्टूबर 2014

उम्रकी देहलीज पर

दिन महीने साल
सरकते है रेतघड़ी से ,
जैसे वक्त फिसल रहा है मुठ्ठीसे ,
चिकनी सी चाहते मुठ्ठी पर मलकर
चाहा की वक्त थोड़ी देर चिपक जाए वहीँ पर ,
पर ये तो वक्त है ,
हर बन्धनसे मुक्त होकर फिसलता रहता ,
हर वक्त चेहरे पर एक लकीर छोड़ जाता है ,
अपने निशां यादोँ में छोड़ जाता है ,
तस्वीरों का एक पूरा आल्बम है कैद ,
वो सब कुछ छोड़कर हमारे पास ,
एक जोगीसा बनकर
घडीका संसार छोड़ जाता है ,
वक्त हमें भुलाता  है ,
वक्त हमें याद कराता है ,
हमें उम्रकी देहलीज पर छोड़कर ,
वो तो सदाबहार बन जाता है  … 

1 अक्टूबर 2014

ये कहने को तो तस्वीरें है दो …



ये कहने को तो तस्वीरें है दो  … 
पर नजर आते है मुझे जीवन के रस्ते दो  … 
एक पहाड़ी ऊँचा नीचा टेढ़ा मेढ़ा चढ़ता उतरता  … 
एक मिलों तक देखें बस एक ही नजरमे सीधे सीधे ,
दूसरे में अगले मोड़ पर क्या होगा क्या है का पता नहीं  … 
एक में चढ़ते हुए आहिस्ता आहिस्ता ,
उतरते भी पैनी नज़र से ,
दूसरा तो चंद  मिनट या घंटे लेता ,
अभी इधर से अभी उधर तक  … 
सफर तेज तर्रार और वक्त की  तेज रफ़्तार  ,
गति में जीवन कहीं पीछे छूट जाता है ,
न रास्ता न मंज़िल दिलचस्प नज़र आता है  … 
और ये टेढ़े मेढ़े रस्ते ठीक हमारे जीवनसे है  ,
कब क्या हो ये भी नहीं खबर  ,
अनजाने से डर के साथ भी लगती खूबसूरत ये डगर  … 
सुस्त होता है एक्सीलेटर पर बड़ा ही चुस्त इंसान अपने अंदर  ,
ये कठिन डगर का मौसम हमें जच जाता  है  ,
पर फिर न जाने क्यों हमें जीवनमे एक्सप्रेस हाइवे ही भाता है  ???
तेज गति सफर का मज़ा कहाँ देती है ,
पता नहीं कौनसी मंज़िल की तलाश में जिंदगी दर ब दर दौड़ती रहती है ???
न हो कठिनाई तो जीवन बेस्वाद बन जाता है ,
सरल रस्तेसे मंज़िल पर जाने का मज़ा भी अधूरा सा रह जाता है  …
(ये तस्वीरें मैंने माउन्ट आबू के रस्ते पर खींची थी और दूसरी एक्सप्रेस हाइवे पर। …)

12 अगस्त 2014

खुद ही जवाब बना जाए ???!!!

जिंदगी एक सफर ,
इब्तदा से इन्तेहाँ तक .
आग़ाज़ से अंजाम तक का  ,
समंदर से साहिल तक का  …
उदय से अस्त तक का   …
अनगिनत मंजर से गुजरना  है  …
कभी कारवाँ का हिस्सा बनकर  ,
कभी तनहा तनहा ही चलना है  …
ख़ुशी के कहकहे है कहीं कहीं  ,
वक्त उस घडी खुद में
मौसमे गम का मंजर है  …
तनहा दिल को अश्कों का साथ है  …
कह देते है जूठ्मूठ ही तब  ,
जाने भी दो यारो ख़ुशी में ये आँखों की नमी है  …
जब गम हो चारो और तब कोई मंजर
हमें चुपके से गुदगुदा देता है
और हम हस भी नहीं सकते
क्योंकि गम में हंसी को
कभी मेहमान होने का हक्क नहीं  …
चलो इस दुनियामें रहकर निभाई जाए दुनिया दारी ???
या खुद की खोज में खुद के साथ चला जाए ???
खुद  के सवाल का खुद ही जवाब बना जाए ???!!!

10 मई 2014

जिंदगी क्या है ...???

जिंदगी क्या है कौन जान पाया है अब तक ???
यही फ़रियाद लेकर हर एक घुम रहा अब तक !!!
जिंदगी कहाँ कोई परिभाषित किया गया शब्द ???
वो तो जीने के खुद के नज़रिये का नाम है  ....
हमारी एक खासियत बड़ी ही खास रही है ये जानो ,
खुद को ढूंढे बगैर दुनियाको देखने का इरादा है अब तक ,
खुदको समजे बगैर कैसे समज आएगी ये जिंदगी ???
दूसरे के ख्वाबों को खुद के घर सजाने की मिथ्या कोशिशभर  …!!!
खुदको जानोगे तो खुदको पाओगे ,
दूसरे को जानने की विफल कोशिशों सी गढ़ी खुद की राह ये ,
दूसरोंकी कामयाबी को केश करने की कोशिशभर बन
रह गयी ये हमारी होते हुए भी हमारी न रही ये जिंदगी  …!!!
खुद के सपने देखने की इजाजत न मिली ज़माने से ,
दूसरोके सपने बसानेका बसेरा बना दी गयी ये जिंदगी   ....
दूसरोंकी खुशीमे अपनी ख़ुशी का गुरुमंत्र देकर  ,
क़र्ज़ के दस्तावेज पर किये हस्ताक्षरसे गिरवी रही ये जिंदगी  …!!!!

7 मई 2014

दिल की गवाही

दिलसे उठी टीस स्याही बनकर
कलमसे गुजर जाती है ,
वो सुफेद सफे के लिबास पर
नज़्म बनकर बीछ जाती है  …
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क्यों ऐसा होता है ?
एक नज़्मको दर्द की स्याही से लिपटना होता है ,
अंगारो पर चलता है दिल फफोले दिल पर लिए ,
बहते अश्कोंमे इश्क़ की इबादत नज़र आती है  …
कोई कहे ग़ज़ल या नज़्म हमें उससे ताल्लुक कहाँ ?
हमें तो उसमे रब से शिकायत नज़र आती है  ....
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इश्क़ में कोई जाना या अनजाना कहाँ होता है  ,
सिर्फ उसमे तो दिल की गवाही समज आती है  …
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सरेराह उसका चले जाना छोड़ हमें तनहा यूँ ,
गवारा न हुआ दिल को फिर भी  ,
हमें तो दो राहों से भले ये जिंदगी ,
मंज़िले तो एक ही नज़र आती है  …। 

6 मई 2014

ये यादों का शहर है …

 ये यादों का शहर है ,
यहाँ यादोंके फूल खिलते है ,
यहाँ यादोंकी खुशबु लहलहाती है ,
यहाँ यादोंकी महफ़िल कहकहाती है ,
यहाँ याद सिसकियाँ भरती है ,
तन्हाईयाँ बिखेरती  हुई वो अँधेरी गलीमें ,
यहीं यादें बैठकर सपनोंके महल बनाते थे ,
वहां पर ही खण्डहरकी दीवारों पर ,
खुदका तराशा नाम ढूंढते है ,
यादोंकी बारिशें भिगाती रही हरदम कभी ,
अब झुलसाती है वो रेगिस्तानकी धुप बनी  .
यहाँ के फूल भी नश्तर चुभाते है ,
यहाँ के खंजर के मंजर भी फूल से लगते है कभी  …
यादोंके शहरमे कितनी भीड़ लगी रहती है ,
कौन कहता है की दिलकी जगह छोटी है ,
शहर बसाकर यादोंका,
हर मौसम बिखराता है ,
सावनमे वो बिरहा को भड़काता है ,
तो फिर कभी सर्दीमे सुलगाता है ,
एक खिलखिलाता शहर है ये ,
बस मन के मौसम के आयने सा ,
तुम्हारे दिल का  अक्स
इस शहरके हर नुक्कड़ पर  उभर कर आता है  …
ये यादों का शहर है  …

26 अप्रैल 2014

क्यों

हर शख्स अधूरा सा ,
हर शख्स पूरा भी है ,
फिर भी तलाश जारी ,
क्यों हर सपना अधूरा ???
नहीं गली कूंचे खाली ,
फिर भी बंद वो किवाड़।,
लगता है मुझे क्यों ,
मेरा जहाँ सुना है ????
अनगिनत यादें है ,
शहर बसाये मुझमें ,
फिर भी हर गलीमें ,
क्यों वीराना मेहमान है ???
दौड़ते हुए भीड़ में ,
कई थामे हाथ छूटे ,
आज हथेलीमें वो
स्पर्श क्यों जिन्दा हुआ है ???

24 अप्रैल 2014

टाट का पैबंद

इब्तदा से इंतेहा तक का एक सफर ,
एक सफर में एक हमसफ़र ,
एक मैं और एक मेरा साया  … 
दिन भर नंगे पैर चलता रहा था मेरे साथ ,
शाम होते है सो गया वो 
अँधेरे के दुशाले को लपेटकर  … 
अब  मैं तनहा तनहा ,
आकाश में चाँद और सितारों की भीड़ में
घिरा घिरा सा ,घुटन को लिए दबाये भीतर ,
मेरी तनहाई को अमूमन बिखेरने के लिए ,
तैयार थे एक बडीसी तश्तरी हाथ में लिए ,
उसमे सपनोकी सुनमहोरें सजी थी ,
सब मेरे लिए ही थी ऐसे भी कहा रातने ,
मेरे कानोमे हवाकी तरंग पर गुनगुनाते  … 
मैं चुपचाप ख़ामोशी से इंतज़ार करता रहा ,
परछाईं के जागने का ,
खुद पर एक टाट का पैबंद लगाकर  ……