4 फ़रवरी 2017

हमारा मिलना जरुरी है .........

वो दिल थी मैं धड़कन  ,
वो सांस थी मैं गर्माहट ,
वो आयना थी मैं अक्स ,
वो बहार थी मैं फ़िज़ा  ,
वो चाँद थी मैं सितारा ,
वो धरती थी मैं गगन ,
वो आस थी मैं प्यास  ,
वो नदी थी मैं किनारा  ,
वो जान थी मैं जिस्म  ,
वो ग़ज़ल थी मैं काफिया ,
फिर भी
वो अपूर्ण थी और मैं भी  ,
इस लिए पूर्णत्व की खोज में
हमारा मिलना जरुरी है  ......... 

1 फ़रवरी 2017

दायरे

सोच की लहरों पर एक तस्वीर तैरती रहती है  ,
जैसे समंदर में चाँद की तस्वीर उछलती है  ,
मनके तरंग को क्या कहे वो काबू में नहीं है  ,
एक डूबती सांझकी बातोंमें तेरे जिक्र की तहरीर रहती है  ....
कहीं खुशनुमा रात बनकर सज रही होगी  ,
कहीं तारों की चादर में ढककर रखेगी अपने चहेरे को  ,
एक उलझी सी लट उस दायरे से निकल कर  ,
तेरी हंसी की गवाही देती होगी  ....
इंतज़ार में कटे कितने ही लंबे सालो के फासले  ,
बस तेरे गांव की सरहद पर बेसब्री यूँ बढ़ी  ,
जैसे जान अभी निकलकर जिस्म से  ,
तेरे ड्योढ़ी पर जाकर बैठी होगी  ......

20 दिसंबर 2016

ये राज़ तो नहीं ????

डूबता हुआ सूरज सागर के ठीक पीछे जा रहा है  ,
न सागर सूखता है और न सूरज बुझता है  ...
दोनों की तासीर अलग ,दोनों की तस्वीर अलग ,
दोनों के मिज़ाज  अलग फिर भी
दोनों एक जगह मिलने के वादे पर अफर  ...
सागर हथेली खोले हुए सूरज को खुद में समाता है  ,
सूरज भी बुझने से बेख़ौफ़ उसकी हथेली में चला जाता है  ,
दूसरी सुबह दोनों ही अपने वजूद को फिर जिन्दा कर जाते है  ,
दोनों मिलो दूर से भी एक हो जाते है  .... पर
पर ये इंसान एक छत के नीचे भी मिलो दूर दिल से  ,
एक दूसरे के अस्तित्व को खत्म करने की घात  में  ,
एक दूसरे के वजूद को नकारता हुआ  ,
बस खुद के जीने के लिए औरों को मारता  हुआ  ....
इस लिए ही इंसान का अंत है
पर सूरज और दरिया अनंत है ये राज़ तो नहीं ????

15 दिसंबर 2016

गुजरती है .....

लब्ज़ टपकते है लहू की तरह  ,
कलमसे जब आग ज़रती है  ...
इतना छोटा सा दिमाग ,
उससे भी छोटा सा दिल ,
क्यों नहीं थकता उसके दायरों से ???
एक सादा सा कागज़
 एक सैलाब बनकर बहता है  ....
ये छोटी सी कलम तोड़े जाती है
ये छोटी सी कलम जोड़े जाती है  ...
कुछ बनते बिगड़ते रिश्ते
बनकर सैलाब कलम से कागज़ तक  ....
एक जन्म जो तय है  ,
एक मौत जो किसी मोड़ पर इंतज़ार में है  ,
उसके बीच के फासले तय करने का नाम
जिंदगी है  ,जो न कागज़ से  ,
न कलम से  , ना सांस से  ,ना नाम से  ,
बस वो तो सिर्फ तुम्हारे काम से  ,
उससे जुडी हर याद से  ,
होठो पर मुस्कान के साथ आँखमे अश्क़ लिए
गुजरती है  ...बस  ... गुजरती है  ..... 

14 दिसंबर 2016

दीदार

जहमत होती है पलकों को भी उठने के लिए  ,
वो तेरे चेहरे के सहारे संभलती है लड़खड़ाने से  ....
यूँ गुमाँ  मत करो अपने हुस्नका सरेआम  ,
घायल हुए दिलसे भी आह निकलती है  ....
हुस्न तो वो पाक नियामत है उपरवाले की  ,
उसके रहमोकरम पर उसकी इबादत करो  ....
तुम समजते रहे की हम तुमसे बेपनाह मोहब्बत करते है  ,
ये तुम्हारी खुशफहमी थी जिसे हम
ग़लतफ़हमी  करार दे न सके   ......
तुम्हारी आवाज में वो पाकीजगी थी
की हमें उपरवाले की तस्वीर दीखाई देती थी  ,
कैसे कहें हम इस आँख से कभी
इस दुनिया का भी दीदार न कर सके है  ...!!!!

10 दिसंबर 2016

वर्तमान

वक्त के इस छोर पर मैं खड़ी थी  ,
वक्त उस छोर पर खड़ा था  ...
मैं मुस्कुराई तो वक्त मुस्कुराया  ,
मैंने हाथ हिलाया तो उसने भी हाथ हिलाया  ,
लगा ऐसे जैसे आयने के सामने खड़ी  हूँ  ...
खुद को निहारती हुई  ,
पर ये वक्त का आयना है शायद  ,
कभी मुझे पीछे सैर कराने  ले चलता
और फिर वहां पर छोड़ता जहाँ खड़ी  थी  ,
हर समय एक महसूसियत के साथ एक चुभन होती  ,
उस वक्त में कितनी खुश थी ???!!!!
 पर एक दिन मैंने पलटकर देखा तो लगा
मैं पीछे रह गयी और दुनिया कितनी बदल गयी  ,
आयने के झांसे को तोड़ कर मैं
मुस्कुराते हुए चल दी  ,
जहाँ  वर्तमान खड़ा था बाहें फैलाये  ...!!!

9 सितंबर 2016

कठपुतली

यह जिंदगी किस करवट  बैठेगी पता नहीं ??!!
जब चाहती हूं वह जो  रुक जाए ,
तो दौड़ पड़ती है सरपट ??!!
जब चाहती हूं अब सरपट दौड़े,
तो नकचढ़ी जिद्दी बच्चे की तरह
 रस्ते में रोते हुए सो जाती है वह ...??!!!
ना उसे उठने का इल्म है
 ना ही सोने का सलीका
बस अपने मनगढ़ंत तरीकों से
अपने आप को डालती रहती है
और मुझे मारती रहती है
जब निराश होकर बैठ जाते हैं
तो फूलों से नहलाती है
और जीने की उम्मीद  फिर से जगाती है....
 जब राह तकते हैं खुशियों की
वह आंसू की बारात लेकर आती है ...!!!!
ना जाने किस खुशफहमी में जीते रहते हैं ???
कहते रहते हैं .....
हम जो चाहे कर सकते हैं
बस सच तो इतना ही है
जिंदगी हमें अपनी उंगलियों पर
कठपुतली की तरह नचाती है.....

24 जुलाई 2016

शायद..

शायद आज नई बात हो
 शायद आज फिर उनसे मुलाकात हो
शायद उन्हें भी याद आए मेरी वह बातें
शायद बे खयाली में उनके लबों पर मुस्कुराहट हो शायद आज वह बात हो
शायद मुद्दतों के बाद यह फुर्सत के लम्हे मैंने पाए हैं शायद उन्हें जीने की ख्वाहिशों वाले उम्मीदें हो शायद वह आए फिर भी मैं चुप रह जाऊ
शायद आज उनकी तरफ से कोई बात हो
शायद जिसकी बदौलत जिंदा रह पाए हैं हम
शायद वह मिले या ना मिले
 और
 मेरे हाथों में मेरे सपनों के टूटे हुए शीशे के टुकड़ों में चाहत के अफसाने हो.....

18 जुलाई 2016

चुभन

नश्तरो की चुभन
तेरा नाम याद दिलाती है
वह दिन में उठती टीस
तेरे नाम से मुझे तेरा पता बताती है अलग से जहां में चले जाते हैं
हर और
यादों के कब्रस्तान नजर आते हैं
घूमते है यहां अब डर नहीं लगता
यादें गूंगी होती है
आवाज नहीं दे पाएगी हमें
पर नंगे पैर घायल होते हैं कांटो से
काटा बनकर वह दर्द दे जाती है
दर्द ही जब दवा बन जाए तो
डर कहां लगता है??
जब मेरी याद करने की आदत गई नहीं तेरी चुभने की आदत गई नहीं
सोचते थे तेरे जाने से मर जाएंगे हम भी पर क्या करें
यह जीने की आदत गई नही…..

2 जुलाई 2016

वादा है मेरा.

कभी तनहा रहने का बहाना ढूंढते थे ,
तेरी यादों के सफे पर लिखे
हर गुजरे लम्हों को जीने के लिये…..
अब तन्हाई से डर लगता है,
फिर से तेरी बेवफाई
सबब न बन जाए मेरी रूसवाई का …..
न तेरा गम है न तेरी जूत्सजु,
तु सलामत रहे तेरे ख्वाबो के साथ ,
मेरी वो पाक यादों पर
तेरा साया भी ना पडे …..
गर कभी सामना हुआ
जिन्दगी की राह पर चलते चलते,
पहचान से भी मुकर जाने का
वादा है मेरा ...।।
बसर जायेगी ये जिन्दगी तनहा भी ,
तेरी यादों की धून्ध मे
मेरा नाम तक तुझे याद न रहे…..