20 दिसंबर 2017

पतझर

पतझड़ मे गिरते पत्तों के साथ
मेरे अल्फाज भी गिरते रहे ....
चमन रो रहा था सिसकियों मे,
अल्फाज अश्क बनकर बहते रहे ....
सुनी डालियों पर सन्नाटे का है घरौंदा,
इन्तजार मे बहार की आहट मे
सरसराहट से टहनी से चिपका रहा वो पत्ता .

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