18 अगस्त 2011

आज गुलज़ारजी के जन्मदिवस पर ...एक कोशिश ...

पूर्णमासीके चांदकी चांदनी उधार लेकर
सफ़ेद लिबासमें लिपटा हुआ ,
वो खुले आकाशकी ख़ामोशीसे अल्फाजोंको चुराकर
आँखों पर ऐनक ऐसे लगाकर आया है
ख्वाबोंसे लपेटकर कितने सपने सच्चाईको समेटता हुआ ....
उसकी नज़रसे देखी हुई दुनिया
खुबसूरत नज्मोंके लिबास पहनाकर चाँदको
किताबोंके बंद किवाड़में लब्जोंके जलवे बिखेरे हुए तारोसे बतिया रहा था ....
आज एक अहले करम कर दो ....
एय फ़रिश्ते ....
तेरी नज़रे नूर को तु जब सो जाए रातोंको गहरी नींदोंमें
एक रात के लिए तेरी नज़र मुझे उधार दे दो ....
सपनोके केनवासको तेरे रंगोंसे सजाकर देखना है ....
फिर भी तेरी दुनिया तो अलग है ...
जानती हूँ फिर भी
आज एक अहले करम कर दो ........

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