24 जून 2011

दूर दूर दूर ...कहीं

कोई बिना शोर करे सरक गया ,
हौले हौले दूर ...दूर ...दूर .....दूर ......कहीं ...
ना कोई सन्देश ,ना चिठ्ठी ,
कल तक तो रोज शाम उठना बैठना था ,
ना उसके नामको याद किये सुबह का होना था ,
ना कोई गिला था उनसे मुझे
ना उन्हें कोई मुझसे शिकवा .......
फिर ये क्या हुआ ???
कुछ चटका ...ना कोई खनक ,ना कोई दरार ,
एक शीशा जिसकी किरचे भी बिखरी नहीं कहीं ,
फिर भी कुछ टूट गया ...
भीतर मेरे ,भीग गया भीतर मेरे ,
तनहा हो गया भीतरसे ,
बस इतनी सी इल्तजा है अय रबसे मेरी ,
उसके दिल पर एक संदेस लिख देना ,
गर भूले से कोई गलती हो गयी
तो बड़े दिल से मुआफ कर देना ......

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