25 जून 2011

सिक्किम की ओर रुख करें तो !!!

माय ड्रीम डेस्टिनेशन ......अ विजिट टू सिक्किम .......
हम गुजराती लोग को दार्जिलिंग चाय कुछ जचती नहीं है ...बिलकुल फिक्की लगे ...क्योंकि दूध से भरपूर कड़क मीठी पिने की आदत ठहरी ...लेकिन हां उसे लेमन टी बनाकर पिने का मजा भी हमने दार्जिलिंगमें सिखा ....तीन दिनमें तो सारा दार्जिलिंग घूम लिया ....फिर बाज़ार में घूमते घूमते पता चला गंगटोक यहाँसे सिर्फ चार घंटे के रस्ते पर है ...और वहां से जलपाईगुडी आरामसे जा सकते है ...कभी सुना या देखा नहीं था वो जगह पर हम तीनो अकेले जाने के लिए रवाना गए चौथी सुबह को ही ....टेक्सी मिलती है पर हेड उस वक्त सिर्फ सवा सौ रूपये चार्ज किया था .....जैसे स्टेट बदला पहाड़ोका रूप भी बदल गया ...अब स्टेप पर बने खेत आ रहे थे ....पेड़ भी बदलने लगे ...बोर्डर पर वेल ड्रेस जवानोने स्वागत किया .......
दोपहरमें पहुचे गंगटोक के टेक्सी स्टैंड पर .....पतिदेव एक अच्छे होटलमें ठहराने का इंतजाम करके आये ...मजे की बात तो ये है की यहाँ स्टिप ढलान पर बनी होटल जितनी ऊपर दिखती है उतनी है अन्दर यानि की हमारी भाषा में तहखानेमें भी निकलती है ...हमें पेंट हाउस जैसा कमरा मिला ......पहले नहाना धोना हुआ ....फिर बाहर शाम पॉँच बजे ही अँधेरा होने लगा ...जब बत्तियां जली तो लगा अरे वाह !!! ये तो हम सितारोंके बीच ही रहने को आ गए यार !!!!फिर खाना नाश्ता करके निकले तब पता चला राजकोटसे आया एक गुजराती फेमिली भी यहाँ ही ठहरा है ...सच कहे हमें वतनसे तक़रीबन ढाई से तीन हजार किलोमीटर पर वो हमारे स्वजनसे बिलकुल कम नहीं लगे ...फिर हमने दुसरे दिन का प्लान बनाया ...वहां से बाबा मंदिर देखने का प्लान किया ...फिर निकल पड़े तीनो गंगटोक की सैर को ....बाप रे एक रोड से दुसरे रोड पर जाने को भी चढ़ाई थी ....वहां रिक्शा तो मिलने से रहा ...चढ़ते रहो बच्चू .....एक होटल पर लिखा था गुजराती थाली ......हँसी आ गयी ....पहुच गए ...पता था दो सब्जी पंजाबी दाल और रोटी एक थाली में परोसे जायेंगे ...और हो जाएगी गुजराती थाली ....पंजाबी पकवान गुजराती नाम ....फिर भी मजा आया ...सफ़र का येही तो मजा है ...गुजराती लोग का ये प्रवास प्रेम ही था की ये गुजराती थाली की खोज नहीं करनी पड़ती ...खाना खाकर एंवे घूम रहे थे ...रस्ते और लोग दोनों डिसिप्लिन वाले थे ...उस दिन दीवालीका अगला दिन काली चौदस थी ...सब दुकान पर लाईट लगा रहे थे ...चहल पहल बिलकुल नहीं थी ....

उस दिन मुझे गुजरात ...मेरा सूरत ...और मेरा वड़ोदरा बहुत याद आ गया ...इस दीवाली कितने दूर थे हम ...कितनी रौनके लगती है गुजरात में पर यहाँ लगता ही नहीं था की दीवाली कल है ....फिर रात आठ बजे मुझे चाय पिने की इच्छा हो गयी ...एक छोटे से होटल के बाहर लिखा था चाय मिलेगी ...मजे की बात तो ये है की मेरे परिवार में सिर्फ मैं ही चाय पीती हूँ ...पर वहां तीनो पहुंचे ...चाय बनाने को कहा और थोड़ी कड़क भी ....बाहर अचानक एक गुजरातकी बोली में आवाज सुनी ....अरे अहिं चा बा मलवानी के नहीं ??? मेरे पति देव ने अन्दर से ही आवाज लगाईं ....आवी जाव अहिं मली जशे ....एक बुजुर्ग उसके डॉक्टर बेटे के साथ आये ....ना जान पहचान पर एक बोली ने बांध दिया हमको ....हमने साथ चाय पी और जैसे कोई दोस्त हो ऐसे वो हमें उनके होटल के रूम पर ले गए ....बातें ऐसे हुई जैसे बरसों से जान पहचान हो ......आज भी मेरे पति उनसे फोन पर बात करते है ...मिया बीवी डॉक्टर थे ...उनका फंडा अच्छा लगा ...पूरा दिन घुमने के लिए महंगे होटल में ठहराने की कोई जरुरत नहीं .....वो लोग प्रवास का असली लुत्फ़ लेने के लिए हमेशा सेकण्ड क्लास में ही घूमकर आनंद लेते है ....

दुसरे दिन सुबह हमारे साथ ठहरे राजकोट के फेमिली के साथ हम बाबा मंदिर देखने रवाना हुए ...ड्राईवरने कहा ऊपर बर्फ वर्षा हो रही है ...दीवाली का सबसे बड़ा त्यौहार था .....उस दिन मैंने सुमो की खिड़की से जो नज़ारे देखे वो मैं शब्दोंमें बयाँ नहीं कर सकती ....ये एरिया पूरा मिलिटरी के कब्जे में है ...पत्थर पर बने रस्ते में जितने ऊंचाई उतनी ही गहराई ...बीचमे बादल के ऊपर हम ...बादल नीचे हम ऊपर ...लगता था वेनीला आइसक्रीम बिछा है ....वहां से छान्गू लेक पहुंचे ...वहां पर हमें किराये पर और कपडे जेकेट ,जूते वगैरह लेने थे क्योंकि ऊपर बारह हज़ार फीट पर बर्फ वर्षा हो रही थी ....नाथुला पास जहाँ पर चाइना बोर्डर है वहां जाने को एक दिन पहले अनुमति लेनी पड़ती है जो वक्त हमारे पास नहीं था तो सिर्फ बारह हजार फीट के बाबा मंदिर पर बरफ की वर्षा को देखते हुए पहुंचे .....सांस थोड़ी फूल रही थी ....पर मजा आ गया ....बर्फ को महसूस की बारिश के रूप में .....चार चार गर्म कपडे पहन कर भी ठण्ड लग रही थी ....दोपहर तक वापस लौटे ...शाम को हमसब ने दीवाली पर्व पर समुह्भोजन किया ..मैं चूरमा के लड्डू ले गयी थी ...उस लड्डू को खाते हुए सब खुश हो गए की चलो दीवाली सच्चे अर्थ में मनाई गयी ......
दूसरी सुबह न्यू जलपाईगुडी के लिए निकलना था ...सुबह बारिश हो रही थी फिर भी निकल पड़े ...सामने लिखा था गुजराती ढोकला मिलेगा ....गए तो कहा थोड़े आगे एक और दुकान है ...बारिश में ढोकले को ढूँढने का ये ट्रेजर हंट भी मजेदार रहा ...गए तो वो तो खमण था ...हँसे फिर भी खाने की मजा ली ....दोपहर एक अच्छी जर्नी के साथ फिर कोलकाता के लिए ट्रेन पकड़ने टेक्सीमें रवाना हो गए .......
वैसे सिर्फ सिक्किम भी जाओ तो वहां युम्ठुम वेल्ली भी है ..और कई हसीं जगह है ...पर हमारे पास सिर्फ एक दिन था तो हम येही देख पाए ...गंगटोक शहर भी अच्छा लगा .....जहाँ नाम तक ना सुना हो उसके बारे में कुछ भी ना सुना हो ऐसी जगह पर जाने का रोमांच ही कुछ और होता है ....गर मौका मिला तो जरूर एक बार सिर्फ गंगटोक जाना चाहूंगी ....आई लव हिमालय अ लोट .........
लोग भी अच्छे ...और प्यारे ...भारत सचमुच हर कौने में अपना अलग सौन्दर्य बिखेरता है ....जाकर महसूस करो ....

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