14 जून 2011

तितली आई ....

एक दिन चाँद सितारे सूरज जुगनू
जमघट लगाकर बैठे थे तालाब के किनारे ...
पेड़ोंकी थी छाया घनी ,
उस पर अंडेवाले घरौंदेकी कतारें थी .....
पंछी बैठे डाली डाली ,
वनचर बैठे पेड़ की छाँव ......
सबके होठों पर एक ही शिकायत है आज ,
सब अपनी स्थितिसे नाखुश है आज ....
चाँद कहे मैं घटता बढ़ता सिर्फ रात और सितारों का साथ ,
सितारे शिकायत करें चाँद को जाने सब हमारा तो ना कोई नाम ,
सूरज कहे मैं जलता रहा युगोंसे तिल तिल कर
जग रोशन होता ही जाए ......
पेड़ कहे हम घूम फिर ना पाए ,
सब छाँव पाए हमसे पर हम तो धुपमें जलते जाए ,
बरखा भिगाए हमें तोड़ भी जाए ,
पर हम से लोग अपनी चीजें बनाये ...
पंछी को दाना नसीब हो जब मिलो पड़े उड़ना ,
वनचर एक दुसरेको खाकर पेट भर पाते अपना ,
डर डर के दिन बिताते ....
तभी आई नन्ही सी तितली फूलोंसे मधु चुराकर ,
कोमल पंख हिलाते रंगबिरंगी लगी वो बतियाने ...
सूरजमामू तुम ये सोचो अपने बारे में ,
आप ही तो है जिसके पास है ताकत की जग रोशन कर पाए ,
चंदामामा क्यों मायूस तुम ??? तुम पर तो सारे जीव प्यार लुटाते ,
सितारों दुखी मत होना तुम बिन चाँद और रात दोनों अधूरे है ...
वृक्ष तुम चलते फिरते ना हो भले ,
तुममे छाँव देनेकी शक्ति ,जीवोके घरौंदे भी सजाते ....
जानवर तुम ये तो सोचो तुम तो क्षुधापूर्ति का कारण हो ,
जो किसीसे रोटी ना छीने पर किसीका पेट भर पाते ...
पंछी तुमतो उड़कर गली गली शहर दुनिया देखकर आते ,
क्यों तुम सब अपनी जिंदगी से खुश नहीं रह पाते .....
कमी तो हम सबमे है बहुत सी ,
पर हमारी एक खूबी से होता है ये जहाँ रोशन .....
उड़ती फुदकती तितली उड़ गयी दुसरे बागान ,
पर संदेसा छोड़ गयी वो खुश रहने के नुस्खे आसान ......

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