12 जून 2011

डब्बा ....

दिमाग एक डब्बा है .....
फ्लेक्सिबल डब्बा ....
बस ठूंसते रहते है हम उसमे सभी वक्त बेवक्त ....
जो देखते जो सुनते जो कहते ....
उसका कोम्प्यूटर भी है अजब ...
सही चीज सही जगह स्टोर करता है ...
रातमें दिमागकी धार नींद के वक्त तेज करता है ....
फिर भी उसमे जब वायरस लगता है !!!
फोर्मेट कैसे किया जाय वही पता नहीं चलता है ....
चलो आज पूरा दिमाग खाली करो .....
बीचोबीच एक अनिच्छित विचारोको छान ले
ऐसी छलनी रखो किडनी जैसे ....
नीचे एक महीन बारीक़ छिद्र बना दो .....
जो है निकम्मा उसे जाने की जगह दो ......
डब्बे की जगह हवा पानी और सूरजकी धुप मिले
ऐसी ही जगह पर बनादो ...
ओवरलोड का खतरा दूर हो सकता है .....
वायरस धुपमें ही जल सकता है ...
मुस्कान बनी रहती है होठों पर सदैव ...
ये जहाँ जीने जैसा लगता है .........
आज रविवार की छुट्टी है तो कल बता देना ,
पर एक संवैधानिक चेतावनी याद रखना ,
डब्बे को अप साइड डाउन मत रखना .....

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