14 मई 2011

जीना इसीका नाम है ....

दीप हॉस्पिटलसे बाहर आया ...
उसने पास के कचरेके बड़े डब्बेमें सारे रिपोर्ट फेंक दिए । बस जो याद रखना था वो सिर्फ एक ही बात थी । उसके पास सिर्फ छ महीने की जिंदगी मुश्किलसे बची है ...और कोई है नहीं जिंदगीमें जिसे उसकी कोई फ़िक्र हो या उसकी जिंदगीमें दीप के होने ना होने से फर्क पड़े ...पापा नहीं थे ..भाई भाभी अमेरिकामें गए तो सात साल में कभी वतन का रुख नहीं किया ...माँके लिए बड़ा भाई सब कुछ था .....
इस रिपोर्ट को रख कर क्या करे ???? हां एक बुआके घर पर रहता था यहाँ बेंगलुरुमें ...अब उसने कुछ और नहीं सोचा ....बुआ जी से कहा कंपनी मुझे छ महीनेकी ट्रेनिंग के लिए जर्मनी भेज रही है ...थोडा पेकिंग करके निकल गया ...सीधा कोलकाता .....
कंपनीसे तबादला भी पहले ही मांग लिया था जो इसी वक्त हुआ ...बुआ को कह दिया की अब जर्मनी से पहले कोलकाता शिफ्ट हो रहा है ....बस एक कड़ी भी टूट गयी .....वहां मेट्रो में जाते वक्त उसकी मुलाकात मितालीसे हुई .एक बेहद हंसमुख लड़की ....एक नर्सरी स्कुलकी टीचर थी ...और शनिवार को एक विकलांग बच्चोकी स्कुलमें जाती थी ....उसने उस स्कुल का पता लिया ..एक शनिवार दीप भी वहां गया ...उधर दर्दसे कराहती जिंदगी थी पर उसमे आंसू नहीं थे ...उन छोटे बच्चोने कमजोरी को स्वीकार करते हुए जीना सिख लिया था ...वो लोग बड़े खुश थे ...बस फिर क्या था !!! दीप ऑफिससे सीधे इधर आकर इन बच्चोके साथ दो घंटे बिताकर ही जाता था ...वहांके ट्रस्टीने भी उसे इजाजत दी ...वो सुबहमें जल्दी उठता था ...उसने एक वृध्धाश्रममें जाना शुरू किया ...जरुरतमंद वृध्धलोग को वो चिठ्ठी लिख देता , उनके लिए चीजें लेकर जाता ...उनकी दवाई ,डॉक्टर के पास ले जाना ये सब उसे बहुत भा गया ...उसकी जिंदगी दौड़ने लगी ...उसे अपनी बीमारी भी याद नहीं आती थी ....
पर वहां के एक स्कुलके ट्रस्टी से ये बात नहीं छिपी की एक इंसानियत का उम्दा काम ये छब्बीस साल का लड़का कितनी लगनसे करता है ...मितालीका एक अच्छा दोस्त बन गया ..रविवार शाम दोनों मिलते और बहुतसे बातें भी करते .....
पता नहीं पर मौतकी कगार पर खड़े दीपको जिंदगीकी जरुरत महसूस होने लगी ...ये चार महीने में पूरी तरह बदली जिंदगीसे वो प्यार करने लगा ....उसके कितने सारे अपने थे जिनको उसकी जरुरत थी ????? वो जिंदगी उनके लिए चाहने लगा ...पर अब बीमारी रंग दिखाने लगी .......वो ट्रस्टी श्री जमनादास एक दिन उसके घर आये और बताया उसे कोलकाताकी महानगर पालिकाने निस्वार्थ नगरसेवक के ख़िताब के लिए चुना है ....
बस बुझते हुए दिएमें और तेल बाकी ना था ...एक सुबह वो उठा ही नहीं ....ना कोई दुःख ना पीड़ा ...बस सुबह दूधवाला आया ...उसने दरवाजा न खोला तो पास पडोसीको जगाया ...और पता चला पंछी तो दूर दूर उड़ गया ...एक चिठ्ठी पड़ी थी पास में ...लिखा था मेरी आँखें और देह मेडिकल कोलेज को दान कर देना ......

उस दिन उस स्कुलका हर बच्चा रो पड़ा ....उस वृध्धाश्रमके हर वृध्ध को जीतना गम उनके अपने संतानका घर छोड़ने का नहीं हुआ था उससे कई ज्यादा आंसू ये दीप दे गया ......उसकी जमापूंजी सारी उसने अनाथाश्रम और वृध्धाश्रमको आधी आधी बाँट दी थी ......
बस मिताली उसकी तस्वीर ले गयी ...उसके मुंहसे ये स्वर निकले जीना इसीका नाम है ....

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