4 अप्रैल 2011

फिर तनहाई

उनके पास कारवां था , उनके पास हुजूम था ,
उनके पास भीड़ थी , मेरे पास तनहाई थी .......
उनके पल औरोंके थे , मेरे पास सिर्फ मेरा वक्त था ....
मैं खुद के साथ थी तभी मैं तनहा ना थी तनहाईके आलममें भी ...
हर कोई मेरे दिल को झख्म देकर जाता रहा ,
मैं सहती रही क्योंकि उसे अपना माना था मैंने ,
मैं सहती रही क्योंकि उनका साथ देने का वायदा किया था मैंने ,
फिर भी झख्म जब नासूर की शक्ल इख्तियार करने लगा ,
मैंने अपने दिल को समजा लिया ,
गम किसीसे बांटकर तकलीफ कम नहीं होती कभी ,
बस ये तो सिर्फ दिल को हल्का करने का बहाना होता है ...
देख सड़क पर उस अजनबी को जो तेरा कोई नहीं ,
उससे कोई तुझे तकलीफ नहीं या झख्म खाने का डर ....
बस जो तेरे इर्दगिर्द घेरे है उन्हें उसी अजनबी सा समज ले ,
बस इस भीड़ में खुद को तनहा ही कर ले ...
बस सुकून ....
दूर दूर तक सुकून .....
बहुत जी लिए तुमने इस जिंदगीको औरोंकी ख़ुशी की खातिर ,
अब आजमा भी ले की उन्हें तेरी परवाह है कितनी ???
या है भी या नहीं ????

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