11 जनवरी 2011

दायरा ...

एक दायरेमें सिमटे वक्तकी उम्मीद आज़ादी ,
वक्त के पंख लगे होते है कट गए कब ?
आखेट हुआ उस बेबस वक्त का भी
पैसा शायद उसे भी खरीद गया होगा ........
पर वक्त की ताकत का अंदाज़ कहाँ वो हरी नोट को ??!!!
यादों के सैलाबमें बह गया वो हरी नोट का नूर ,
अब सिर्फ वक्त शेष बचा हुआ है दामनमें ,
कीचड़में सना फिर भी धोने पर सच्चे सोने सा .....
फिर वही समां फिर वही धुआं ...
फिर वही लम्हा ...
बस अब तुम्हारा इंतज़ार है ......

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