20 जनवरी 2010

रौनके लगी थी

एक पेड़की ठूंठ पर एक छोटे से पत्तेने सदा दी

जिंदगीका गला खुद घोंटनेके लिए जो फंदा बनाया था

उस निराश आदमने ,

रस्सा ले वापस लौट गया .....

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उम्मीदके उजालेकी प्रतीक्षामें

पिछले पहर आँख लग गयी ,

नींद खुली तो शाम फिर ढलने लगी थी ....

सूरजने कुछ रौशनी दे दी थी ,

जहनमें नए ख्याल की रौनकें लगी थी ......

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इब्तदा करने का इंतज़ार ना कर जानम ,

तेरे क़दमों को हरारत दे दे ,

इंतज़ारकी इन्तेहाँ खुद ब खुद

मंजिल पर मिल जानी है .......

1 टिप्पणी:

  1. इब्तदा करने का इंतज़ार ना कर जानम ,

    तेरे क़दमों को हरारत दे दे ,

    इंतज़ारकी इन्तेहाँ खुद ब खुद

    मंजिल पर मिल जानी है .......
    आपसे सहमत हूं।

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