21 दिसंबर 2009

फ़िर एक सुबह

फ़िर एक सुबह के इंतजारमें

ये दिल बेकरार हो चला

रातभर नींद न आई और

सवेरेकी तलाशमें एक और सफर तय हो चला ....

कल सवेरे आएगा सूरज

अरमानोकी डोली में बिठाकर सपनो को मेरे ,

बस बादल घिर आए और सूरज ढँक गया ,

शायद सूरज नहीं तो क्या इसका उजाला ही काफ़ी है

तलाशे मंजिल के और मक़ाम बाकी है ....

2 टिप्‍पणियां:

  1. फ़िर एक सुबह के इंतजारमें

    ये दिल बेकरार हो चला

    रातभर नींद न आई और

    सवेरेकी तलाशमें एक और सफर तय हो चला ....


    एक सुन्दर अह्सास...

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