30 जुलाई 2009

शमा .....

एक मोमबत्ती हूँ ....

रौशनी को समेटे हूँ अपनी आगोशमें ,

बस एक चिनगारी के इंतज़ारमें

बैठती हूँ अपलक ...........

जब तक अँधेरा नहीं मेरे वजूद का क्या मतलब ?

बिजली की चकाचौंधमें मेरा अस्तित्व कहाँ ?

हाँ ...शायर की महफ़िल में जलती रहती हूँ मोम के आंसू लिए ,

परवानों का इंतज़ार करती हुई ............

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब..खुद जल कर भी दूसरों को रौशनी दे...यही तो शमा... का कमाल है...

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  2. एक मोमबत्ती हूँ ....
    खूबसूरत एहसास

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