18 जुलाई 2016

चुभन

नश्तरो की चुभन
तेरा नाम याद दिलाती है
वह दिन में उठती टीस
तेरे नाम से मुझे तेरा पता बताती है अलग से जहां में चले जाते हैं
हर और
यादों के कब्रस्तान नजर आते हैं
घूमते है यहां अब डर नहीं लगता
यादें गूंगी होती है
आवाज नहीं दे पाएगी हमें
पर नंगे पैर घायल होते हैं कांटो से
काटा बनकर वह दर्द दे जाती है
दर्द ही जब दवा बन जाए तो
डर कहां लगता है??
जब मेरी याद करने की आदत गई नहीं तेरी चुभने की आदत गई नहीं
सोचते थे तेरे जाने से मर जाएंगे हम भी पर क्या करें
यह जीने की आदत गई नही…..

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