23 अक्तूबर 2015

लम्हा

गुस्ताखी हो गयी
वक्त से एक लम्हा उधर मांगने की …
वक्त रूठ गया
मिलो चलता गया मुड़के न देखा कभी  ....
वक्त के साये
हमेशा अपने पीछे परछाई छोड़ते है  ....
वो नही होते
अंधेरों या उजालों के मोहताज  ....
तक़दीर से ही
लिखे जाते है हमारे जीवनके सफों पर  ……
वक्त शायद
बहरा और गूंगा होता है और प्रिज़म सा  ....
हर रंग हर एक को
अलग सा दीखता है जो होता है सफेद  …
कहते है सब
वक्त सब से बड़ा शक्तिशाली होता है  …
पर देखा उसको
बड़ा कमजोर है पहली बार माँगा लम्हा दे न सका  ……

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