18 सितंबर 2015

वक्तकी ऊँगली

एक चाहतका बुलबुला दिलकी सतह पर ,
इंतज़ार करता रहा चाँद के दीदार का  …
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वो बेखबर बैठे रहे तकल्लुफ करते हुए  ,
और प्यार के इज़हार का मुहूर्त लौट गया  …
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निगाहों ने कोई ऐतराज किया तो नहीं  ,
फिर भी ज़िज़क ये कैसी की बोल होठोंकी देहलीज पर रुक गए !!!??
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वक्त कभी ठहरता कभी रुकता कभी चलता रहा ,
पर तेरे तसव्वुरसे वक्तकी ऊँगली छूट गयी मुझसे। ।!!!!!
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