16 सितंबर 2015

उसे शक है

वो हर रोज नाम बदलकर आता है ,
हर रोज खुद की पहचान बताता है ,
उसे शक है मेरी याददास्त पर  या
मुझे पहचान नहीं पाता है ????
लेकिन उसे मेरा इंतज़ार रहता है हर सुबह ,
मेरी खिड़की के खुलने पर वो बेक़रार होता है ,
कोई जन्मोंका बंधन है ,
या बस एक आदत पाल ली है हम दोनोने ???
वो मेरी रौशनी है ,वो सूरज बनकर आता है  ,
मेरी खिड़की खुले न खुले वो दस्तक जरूर दे जाता है   …
आदत कभी कभी प्यार में तबदील हो जाती है  ,
कभी प्यार की भी एक आदत सी पद जाती है  ....
कभी आसमाँ  में छुट्टी की दरख्वास्त लिख देती हूँ  ,
कभी वो बादल में मुंह छुपाये मुझे चिढ़ाता है  ....
एक खिड़की का इस आसमान से रिश्ता घना है  !!!
खिड़की के अंदर की दुनिया महल होते भी छोटी है  ,
वो किवाड़ों के पार एक अनंत आकाश है सपनोंका  .... 

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