7 सितंबर 2015

वक़्त सूख रहा था....

वक़्त सूख रहा था ,
रेगिस्तान सा  …
हसरतें सब बिखरी पड़ी थी ,
दिलकी जमीं पर रेत सी  ....
तिनका तिनका बूटा बूटा
खामोश था निहारते हुए  ....
किसीके आने की दस्तक का इंतज़ार था  ,
खुला दरवाजा टकटकी लगाये बरबस ,बेबस सा  …
वो नमी जैसे बन गयी थी लावा ,
बस किसीको पता न चला   ....
तन्हाई जो तुम्हे याद करने के लिए ढूंढते थे कभी  ,
आज यादों की संदूक   उठाये घूम रही थी दर दर   …
बस उसका मेरी जिंदगी से जाना गवारा था  ,
पर उसका दुनिया को ही अलविदा कह देना गवारा न हुआ  …। 

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