4 अक्तूबर 2014

उम्रकी देहलीज पर

दिन महीने साल
सरकते है रेतघड़ी से ,
जैसे वक्त फिसल रहा है मुठ्ठीसे ,
चिकनी सी चाहते मुठ्ठी पर मलकर
चाहा की वक्त थोड़ी देर चिपक जाए वहीँ पर ,
पर ये तो वक्त है ,
हर बन्धनसे मुक्त होकर फिसलता रहता ,
हर वक्त चेहरे पर एक लकीर छोड़ जाता है ,
अपने निशां यादोँ में छोड़ जाता है ,
तस्वीरों का एक पूरा आल्बम है कैद ,
वो सब कुछ छोड़कर हमारे पास ,
एक जोगीसा बनकर
घडीका संसार छोड़ जाता है ,
वक्त हमें भुलाता  है ,
वक्त हमें याद कराता है ,
हमें उम्रकी देहलीज पर छोड़कर ,
वो तो सदाबहार बन जाता है  … 

7 टिप्‍पणियां:

  1. वक्त किसी की नहीं सुनता -उसका अपना ही राग है !

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  2. सुंदर प्रस्तुति ...
    मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है.
    एक बार ज़रूर पधारिए.
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
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  4. चिकनी सी चाहते मुठ्ठी पर मलकर
    चाहा की वक्त थोड़ी देर चिपक जाए वहीँ पर …. ekdam anoothi kalpana … bahut sundar evam prabhavshali rachna …

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