1 अक्तूबर 2014

ये कहने को तो तस्वीरें है दो …



ये कहने को तो तस्वीरें है दो  … 
पर नजर आते है मुझे जीवन के रस्ते दो  … 
एक पहाड़ी ऊँचा नीचा टेढ़ा मेढ़ा चढ़ता उतरता  … 
एक मिलों तक देखें बस एक ही नजरमे सीधे सीधे ,
दूसरे में अगले मोड़ पर क्या होगा क्या है का पता नहीं  … 
एक में चढ़ते हुए आहिस्ता आहिस्ता ,
उतरते भी पैनी नज़र से ,
दूसरा तो चंद  मिनट या घंटे लेता ,
अभी इधर से अभी उधर तक  … 
सफर तेज तर्रार और वक्त की  तेज रफ़्तार  ,
गति में जीवन कहीं पीछे छूट जाता है ,
न रास्ता न मंज़िल दिलचस्प नज़र आता है  … 
और ये टेढ़े मेढ़े रस्ते ठीक हमारे जीवनसे है  ,
कब क्या हो ये भी नहीं खबर  ,
अनजाने से डर के साथ भी लगती खूबसूरत ये डगर  … 
सुस्त होता है एक्सीलेटर पर बड़ा ही चुस्त इंसान अपने अंदर  ,
ये कठिन डगर का मौसम हमें जच जाता  है  ,
पर फिर न जाने क्यों हमें जीवनमे एक्सप्रेस हाइवे ही भाता है  ???
तेज गति सफर का मज़ा कहाँ देती है ,
पता नहीं कौनसी मंज़िल की तलाश में जिंदगी दर ब दर दौड़ती रहती है ???
न हो कठिनाई तो जीवन बेस्वाद बन जाता है ,
सरल रस्तेसे मंज़िल पर जाने का मज़ा भी अधूरा सा रह जाता है  …
(ये तस्वीरें मैंने माउन्ट आबू के रस्ते पर खींची थी और दूसरी एक्सप्रेस हाइवे पर। …)

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