10 मई 2014

जिंदगी क्या है ...???

जिंदगी क्या है कौन जान पाया है अब तक ???
यही फ़रियाद लेकर हर एक घुम रहा अब तक !!!
जिंदगी कहाँ कोई परिभाषित किया गया शब्द ???
वो तो जीने के खुद के नज़रिये का नाम है  ....
हमारी एक खासियत बड़ी ही खास रही है ये जानो ,
खुद को ढूंढे बगैर दुनियाको देखने का इरादा है अब तक ,
खुदको समजे बगैर कैसे समज आएगी ये जिंदगी ???
दूसरे के ख्वाबों को खुद के घर सजाने की मिथ्या कोशिशभर  …!!!
खुदको जानोगे तो खुदको पाओगे ,
दूसरे को जानने की विफल कोशिशों सी गढ़ी खुद की राह ये ,
दूसरोंकी कामयाबी को केश करने की कोशिशभर बन
रह गयी ये हमारी होते हुए भी हमारी न रही ये जिंदगी  …!!!
खुद के सपने देखने की इजाजत न मिली ज़माने से ,
दूसरोके सपने बसानेका बसेरा बना दी गयी ये जिंदगी   ....
दूसरोंकी खुशीमे अपनी ख़ुशी का गुरुमंत्र देकर  ,
क़र्ज़ के दस्तावेज पर किये हस्ताक्षरसे गिरवी रही ये जिंदगी  …!!!!

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