9 दिसंबर 2013

रूठी हुई महबूबा सी

रूठी हुई महबूबा सी ये शाम बैठी है खिड़की पर ,
कुछ धुँधली सी याद के परदे लगाकर पलकों पर ,
सामने बैठी हुई चिड़िया की चहचहाट की डूबती हुई आवाज ,
बस तन्हाई के आगाज़ की नईनवेली नज़्म लिखने बैठी है  ....
इस रात भी आएगा चाँद थोड़ी ठंडक लिए पहलु में ,
रात से इश्क़ महोब्बत के किस्से दोहराएगा फिर से ,
बस ये आँखे कुछ भी न सुनेगी या पढ़ेगी चाँद पर लिखा हुआ ,
बस सिर्फ नाम पढ़ती रहेगी अनलिखा सा तुम्हारा  ,
जो लिखा जाता था हर सांस की कलमसे सितारोंकी तश्तरी पर  …

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