19 जून 2013

देखो मेरी हथेली भी...

पत्ते को हरा रंग देकर
बूंदे  लिखने बैठी उस पर
अपने इश्क की दास्ताँ ,
वो सारे एहसास बैठे ,
कुंडली रमाकर वहां पर ,
और सारे अल्फाज़ सरकने लगे ,
पत्ते से जैसे
कोई बच्चा सरक रहा हो ,
फिसलपट्टी से खिलखिलाता .......
वो खिड़की पर चिपक गयी ,
और वो चुपके से आई एक किरण
बादलके बीच से ,
उस पर एक इन्द्रधनुष लिख गयी ...
और मेरी हथेली पर चांदनी
दिनमें आकर सरसराहट कर गयी ,
देखो मेरी हथेली भी बुन्दोकी
ठन्डे एहसाससे गीली सीली बन चली .....

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