16 मार्च 2013

यूँ बेक़रारसी

बड़ी मशरूफ है मौसम भी गुफ्तगूमें बहारसे ,
बस हमारे शब्द को लिखने भरकी स्याही नहीं बाकी ......
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कैसे कह देते  तुमसे  क्या हमारे दिल में था ???
हमें तुम्हारे रूठ जाने का डर रहा हर वक्त जब मिले हम तुम !!!
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खामोश गुस्ताखियाँ तो आदत रही इन मस्त नैनोंकी ,
पता नहीं क्यों दिल घायल हो जाते है इन मस्त अदाओं से ...!!!
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कभी शाम ढलती है यूँ ही बेक़रारसी ,
तुम्हारी यादोसे आसमान भर देती है ....!!!
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दिल का धडकना यूँ तो कोई ख्वाब  न था ,
बस उनके ख्यालसे दिल धडक जाता है .......

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