10 सितंबर 2012

कभी कभी

कभी कभी फिल्मे जिंदगी जैसी लगती है ,कभी कभी जिंदगी फिल्मे जैसी लगती है ...कहते है कहानी का बीज फिल्मोंमें असली जिंदगीसे ही लिया जाता है ..और फिल्मोमें हम अपनी जिंदगीके कई अंश देखते है ....
आज का युग कहाँ है उसका सबसे अच्छा उदहारण फिल्मे ही होती है ..निरी कल्पना लगने वाले द्रश्य कभी हकीकत भी बन जायेंगे ये यकीं हो जाता है ....
कुछ गिनी चुनी फिल्मे मैं सिर्फ इस लिए देखने जाती हूँ की वर्तमान युवाकी समज को उनकी समज से समज सकू ...उसी तरह में मैंने देखी कोकटेल .....एक बिंदास जीवन पसंद होते हुए भी बीवी के रूपमें तो भारतीय युवा एक सुल्ज़ी हुई लड़की को पसंद करता है ....
मेरी माँ जब मैं पढाई करती थी तब उसे कुछ नहीं आये तो एक सही दलील जरुर करते : बेटे हम ज्यादा पढ़े लिखे तो नहीं है ,सातवी कक्षा पास की है बस .....
लेकिन आज मैं कुबूल करती हूँ की मेरी और मेरी माँ की परिस्थितिमें कोई फर्क नहीं ....मैंने 1985 में एम् कोम की पढाई की थी ..आज मेरी बेटी भी एम् कोम कर रही है ...पर मेरी परिस्थिति मेरे माताजी जैसे ही है ..मुझे कहना पड़ता है बेटे अपने सर से पूछ लेना ..मुझे ये नहीं आता है ....अपनी माँ से कहती हूँ की आप तो पढ़े नहीं थे और कह देते थे पर मेरी तो डिग्री भी मुझे अभी आउट ऑफ़ डेट लगने लगी है ....
हमारे समाजने देश ने दुनियाने कितनी तरक्की की है पर शायद हम उसके साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पाए ...सतत बहार जाना बेहद जरुरी , नेट पर अपडेट रहना भी जरुरी ...काम करना भी जरुरी ...हर चीज़ दौड़ती फांदती नज़र आती है ..और हमारे पांव धीमे लगते है ..या फिर रुके रुके से .....फिर सोचती हूँ की हम जिन्दा है या नहीं ....?? हमारे वक्तमें पढाई कभी बोज़ नहीं लगी और अब पढाईके बोज़से लदे  हुए कोमल कंधे देखकर बच्चो पर तरस भी आता है ...ये भागना किस लिए ?? मकसद क्या है ?? ये सोचने के लिए कोई कभी रुका नहीं और रुकेगा भी नहीं .........
बहुत आराम भरी जिंदगी हो चुकी है फिर भी आराम नहीं ...मशीनसे कपडे धोते है और कसरत के लिए जिम की फीस भरनी पड़ती है ....माइक्रोवेवमें फटाफट खाना तो बन जाता है पर चूल्हे और तंदूर का खाना खाने होटल जाना पड़ता है ....तंदूर से किसी और घरका चूल्हा भी जलता है .....मोबाइल पर पति पत्नी का संपर्क बना रहता है पर दोनोंका शहर ,ऑफिस और शिफ्ट अलग होते है ...लेकिन बेडरूममें थके  हुई अधमरे इंसान सिर्फ आराम फरमाते है .....बच्चो के लिए खिलौने का ढेर होता है ..पर जिसका पल्लू पकड़कर रो सके वो माँ का पल्लू नहीं ...मोम तो जींस पहनती है फिर भी मोम ही है पर उसके पास भी बच्चों के सुखद भविष्य को लेकर सपने होते है और उन्हें पूरा करने के लिए वो स्कूटी लेकर ऑफिस जाती है ..बातें एस एम् एस और मोबाईलसे होती है पुरे जहाँ से ....दोस्तों से ,रिश्तोसे ,पर वो चाय की कितली पर कटिंग चाय गूम है ....अतिथि तुम कब जाओगे का फंडा  है ....
और डॉक्टरोंके फोन नंबर है स्ट्रेस मेनेजमेंट के लिए , गुमराह बच्चोंको राह पर लाने के लिए ....
लगता नहीं की हमें हफ्ते के एक दिन सचमुच रुकना चाहिए ???????

3 टिप्‍पणियां:

  1. कल 23/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. वक्त की जरुरत ही नए आयाम तय करती है ,अच्छा लिखतीं है ,बधाई कभी यूँ ही मेरे ब्लॉग की तरफ भी आयें सदा स्वागत है |

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