11 जुलाई 2012

...वर्ना तो .....

कभी कभी सोचती हूँ की ये जिंदगी रोज कितनी जल्दी चलती है ?? ये हम तब महसूस करते है की जब हमारे बहुतसे काम निपटाने बाकी रह जाते है ,और जिंदगी उस दिन रेंगते हुए दिखती है जब हमें कोई काम करना नहीं होता ...लेकिन जिंदगीका चलना तो तय है ही इस सच को कोई झुठला नहीं सकता ......
बस एक फेशन चल पड़ा है , वक्त नहीं है कहनेकी ....
कभी ये हिसाब नहीं लगाया हमने की हमारा वक्त कैसे कटता है ?? मतलब हम किस काममें कितना वक्त देते है ...
चलो एक हिसाब लगाकर देख ले ...
सुबह उठकर आलसको बाय कहने के पांच मिनट ... ब्रश, शौचादिमें बीस मिनट , फिर चाय नाश्ते के दस मिनट ,पेपर पढनेमें आधा घंटा लगा लेते है ..फिर नहानेके पंद्रह मिनट ,तैयार होनेके पंद्रह मिनट , ऑफिस पहुँचने के दो से ढाई घंटे ( मेट्रो को मत गिनो और अप डाउन करने वाले भी शुमार नहीं इसमें )....और फिर ऑफिसमें :
हाय हेल्लो पहली चाय 15 मिनट ...फिर सुस्ताते हुए फ़ाइल देखते काम शुरू करते वक्त पौना घंटा समाप्त हो चूका होता है ..और फिर रफ़्तार पकड़ती है गाडी लंच तक ...लंच ओफिसिअल आधे घंटे का और प्लस आधा घंटा अनोफिसिअल ....कुछ खास लोग के लिए ...अगर आप छ बजे छूटते  है तो लगभग पांच  के बाद कोई काम करने का मूड नहीं होता ...हा साहब लोगोंकी मीटिंग इसी वक्त शुरू होती है ...उन्हें इंस्ट्रक्शन देने का अर्जंट काम इसी वक्त याद आता है और फिर रुकना पड़ता है बिना ओवर टाइम के ....और जाते हुए देखोगे की ओह कितना काम अभी शेष रह गया ..चलो कल !!!!! फिर घर पहुँचो ,चाय नाश्ता खाना बच्चोंका होम वर्क ..ढाई घंटे ..या फिर टी वी .....बिलकुल वक्त नहीं ...
पर कुछ वक्त इस तरह गुजरा :
1. बीस मिनट तक नीचे चाय की लारी पर और पान खाने का वक्त ...
2. ऑफिस के टेलीफोन पर अपने रिश्तेदारोंको फोन पर गपशप ..और सामाजिक फ़र्ज़ का निपटारा ....और सगे सम्बन्धी के भी इनकमिंग कोल भी शामिल है .....पत्नीके आते हुए लाने की चीजों की लिस्ट , बच्चों की तूतली जबानमें फरमाइश .....
3.कुछ जलपानके एक्स्ट्रा प्रोग्राम ....कुछ अर्ली गोइंग ....
4.रिसेस टाईममें सगे सम्बन्धीकी खबर देखने हॉस्पिटल जाना ..या शादीकी दावत भी शामिल है .....
5. ये नियम बोस और कर्मचारी दोनों पर लागु होते है .........
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फिर हम बहाने देते है वो किस को देते है ??? जो हमारे लिए कुछ कामके नहीं है ...जिसकी हमें कोई खास जरुरत नहीं है ....
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ये बात उस वक्त की है जब मैं नौकरी करती थी ...
मेरे पियोनने एक दिन पूछा : बहेन , आप शार्प दस बजे ऑफिस टाइमके दस मिनिट पहले आते है , और आते ही काम शुरू कर देते हो ...रिसेसमें भी कुछ अर्जंट न हो तो बहार नहीं जाते ...ऑफिस ख़त्म होते है घर चले जाते हो ....और लोगो को भी देखो ...वो तो आरामसे सब करते है बहाने भी कर लेते है ....और सबसे बड़ी बात हर साहब आपकी इज्जत करते है और आपको तो इजाजत भी मिल जायेगी फिर ऐसे क्यों ??????
मैंने कुछ भी नहीं कहा ...
अकाउंट विभागमें स्टाफ सेलेरी करती थी ...इस लिए दो दिन पहले सेलेरी शीट लेकर वो पियोन मेरे पास आया ...मैंने कहा ठहरो : मैं ये काम किसी बोस को खुश करने नहीं करती ..पर मेरी वफ़ादारी इस पगार के प्रति है जो हर माह मुझे मिलती है ...कोई कुछ देखता नहीं या कहेगा नहीं पर उपरवाला सब कुछ देखता है और हिसाब भी ल रखता है ...मुझे जिस काम के लिए रखा है उसके लिए मैं ऑफिस टाइम में प्रतिबध्ध हूँ ...और ये सच्ची कमाई होगी तो इस कमाई से मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं आयेंगे आयेंगे तो भी भगवन मेरी सहायता करेंगे ही  ...तुम तो सबका देखते हो न !!!!! सबकी तकलीफ भी जानते होंगे !!!...वो मुस्कुरा कर चल दिया .......
अगर हर काम वक्त से निपटाना आएगा तो आपके पास जो भी करना हो उसके लिए जरुर वक्त निकल आएगा ...वर्ना तो .....

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