22 अप्रैल 2012

चाँदके पहलु पर...

ये हवाएं जब कागज़ का टुकड़ा बन जाती है ,
इधरसे उधर कितना इठलाकर लहेराती है ,
एक कागज़ पर लिखी जिंदगीकी किताब किसीने ,
उसके पन्ने बेपरवासी यूँ उड़ाती हुई पढ़ जाती है .....
उसके दिलमे राज़ छुपे है कई ,
वो तो बस रोशनी और अंधेरोंसे सारे बाँटती है ,
और रौशनी और अँधेरे भी है खामोश बरबस ,
वो बस चाँद और सितारोंको कहकर 
सारे राज सूरजकी सिगड़ीमें जलाकर आते है .....
वो सारे राज़ आज रौशनी बनकर फिर आँगनमें बिखर गए ,
कलम कागज़ भी खामोश बैठकर सुन रहे थे ,
और वो सारी अनकही हवाओंके संग कह गए ......
बस हवाका रुख ही सही नहीं रहा होगा ,
वर्ना सजनकी खिड़की पर भी मेरा संदेसा जाता ,
जिसे सुनकर उनका भी दिल  मेरे लिए 
सिर्फ एक पलके लिए ही सही ,
पर धड़क तो जाता !!!!!!!!!
बस चांदके उस टुकड़े पर रह गया है थोडा सा पैगाम ,
रात को खिड़कीसे देखना जरुर ,
मेरे दिलकी ख्वाहिशें कुछ लिखी हुई थी जिस पन्ने पर 
उसका सबसे सुन्दर एक ख्वाबवाला टुकड़ा ,
चाँदके पहलु पर अटका हुआ है !!!!!!

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