15 अप्रैल 2012

कुछ कोरे पन्ने बिखरे हुए मिले ...

कल अलमारीसे कुछ कोरे पन्ने बिखरे हुए मिले ,
थोडा लिखा था उस पर ,थोड़े अधलिखेसे भी मिले ,
हर पन्ना कोरे कागज़से जल रहा था ,
खुदका बदन मैला था ये शिकवा कर रहा था ....
हर पन्ने का अपना वजूद था ,
वहां पर कोरे पन्ने पर भी अनकही दास्ताने थी ,
जिसे कलमका साथ नसीब नहीं था .....
और जिसे कलमने साथ दिया था
उससे स्याहीने बेवफाई कर दी और दास्ताँ अधूरी रह गयी .....
अपनी आरजूओ को लिखते हुए ,
मैंने उस पन्ने के आंसू पोछ दिए ,
जाने कितने मेरे दिल पर लगे झख्मसे
लहू बनकर लब्ज़ बह गए ....
एक सुकून था ...
हवा के साथ उड़ते हुए उस पन्ने को भी की वो कोरा न था ...
एक सुकून था ....
मेरे दिलके धुले वो झख्मको भी की अब कोई बोज़ न था ...

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