7 अप्रैल 2012

महेंगाई डायन...

मुझे अपने बचपनके दिन याद आते है ...डेरीके दूध की ५०० मिलीलीटर की बोटल सिर्फ पचास पैसेमें मिलती थी ..पापा की तनख्वाह महीनेकी १८० रुपये थी ...१०० रुपये वो घर पर मम्मी पापाको भेजते थे और ८० रुपयेमें बचतके साथ पुरे महीने का खर्च भी चलता था ....नमक १० पैसे किलो ...और सिंग तेल मिलता था १ रूपये का एक किलो ...नहीं ये बिलकुल गप्पे नहीं है ये सचके दाम ही है ...सोना तब मिलता था ८० से १०० रूपये तोला....
आज के दाम लगा दो तो केल्क्युलेटर लेकर कितने प्रतिशत महेंगाई बढ़ी वो गिनती करने मत बैठना ....
चलो आज इस महेंगाई डायनके बारेमें कुछ अलग अंदाजमें बात करते है ...
 तब हमें पैदल जानेमें कोई शर्म नहीं थी ....घरके काम खुद करनेमें कोई शर्म नहीं थी ...संयुक्त कुटुंबके कारण थोड़ी प्लस माइनस कमाई वाले भाई का भी आसानीसे समावेश हो जाता था ...स्कूलमे तो पढाई के साथ दुनियादारीकी भी सिख मिलती थी ....शिक्षककी पढ़ाने की रीत ऐसी होती की ट्यूशनकी जरुरत ही नहीं पड़ती थी ...और ट्यूशन बहुत ही कमजोर बच्चे के लिए विकल्प होता था ...उसकी मजाक बनाई जाती थी ....माँ बाप को बच्चे कौनसी कक्षामे पढ़ते है ,कितने नंबर आये कुछ पता नहीं होता था ....उनको जो पढना लिखना हो वो आज़ादी थी ...उसमे उनकी रोकटोक भी नहीं थी .....टी वी या आधुनिक उपकरण थे ही नहीं ...वेकेशन मामा या चाचा के घर गुजरते थे ...दादा दादी की कहानियांसे कल्पना खिलती थी .....स्कुल जाने को लक्जरी चीज सायकल थी वर्ना पैदल ...वो अम्बिया पर चढ़ना और पेडोके पीछे छुपनछुपी खेले है हम भी ....एक बीमार पिल्ले के इलाजमें पुरे मोहल्लेके बच्चे लग जाते थे ...हर घरसे एक रोटी मिल जाती थी ...माँ पहली रोटी गाय को देती थी ....तो गाय को प्लास्टिक की थेली नहीं खानी पड़ती थी ...शादी ब्याह घर आँगनमें होता था .......
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अब ये जो ऊपर लिखा है उसके साथ आज के जीवन की तुलना तो आप साथ साथ कर ही रहे है ..मुझे पता है ...और जरा गौर से सोचे तो किस वजह से ये महेन्गाइने हमारा जीवन दुश्वार कर दिया है उसका ख्याल आ गया होगा ...अर्थ शास्त्रमें पढ़ा था अगर मांग ज्यादा हो और उस चीजकी कमी हो तो भाव बढ़ते है ...जब पुरवठा बढ़ जाता है तो दाम कम होते है .......
खुद का घर और गाडी ...स्टेटस के लिए जूझता हुआ इंसान इनकी किश्तोंमें अपनी कमाई का कितना हिस्सा खर्च करता है ...कितनी चीजे उसने किश्तों पर खरीदी है ..उसमे महीनेका एक बड़ा हिस्सा चला जाता है ...बच्चे के ट्यूशन और स्कुल ( पब्लिक स्कूल  स्टेटस के लिए बेहद जरुरी ,चाहे बच्चा समज रहा हो या नहीं ) की फीस ,कार का पेट्रोल , काम वाली बाई की तनख्वाह ...अब क्या है फिर फिटनेस के लिए जिम की तगड़ी फीस भी भरो ...एल इ डी टी वी पर पुरे दिन पोप कोर्न खाते हुए फैलते रहने के बाद जिम तो जाना लाज़मी है ...और मोम और डेड तो नौकरी कर रहे है ...केसेरोलमें रखे खाने को लेकर पुरे दिन कार्टूनमें मन लगाने वाले बच्चे को दादा दादी की कहानी तो नसीब नहीं ..ट्यूशन तो कम्पलसरी ...और बचपनसे कार स्कुल छोड़ने आती है या रिक्शा या अपना वेहिकल तो कसरत की गुंजाइश ही कहाँ है ?? तो मोटापा , चश्मे तो युही मिल जाते है इन आरामशुदा जिंदगीके साथ .....खुले मैदानमें खेलना तो सपना है ...अब  तो प्ले स्टेशन ही साथी अपना .......महेंगे क्लब की फी तो भरनी पड़ती है सोसिअलाईट  बननेके लिए .....अब छोटी उम्र में आते हार्ट एतेक और मधुमेह के कारण एक मेडिक्लेम पालिसी और डॉक्टर की फीस भरनी भी लाजमी है ...
अब हिसाब लगाओ ये महेंगाई सचमुच  ही है न !!! की हमने ही खुद को सस्ता बना दिया है .....
सादगी की जिंदगी हमें स्वास्थ्यके साथ कम प्रदुषण ,कम टेंशन ,और स्नेह प्यार का जीवन हमारे परिवार को आज भी दे सकती है ....पिज़ा इन के पिज़ा की जगह माँ के हाथ के सरसों की सब्जी  और मक्के दी रोटी आज भी सस्ते ही  है ...आपकी मासिक आय चालीस हजार है तो सोने के दाम अट्ठाईस हजार है ...आय के साथ हर चीज बढ़ी है पर हमारी मांगने हमें मार डाला है ...

3 टिप्‍पणियां:

  1. प्रीति जी,जैसे जैसे भोगवाद बढता जाएगा ये समस्याए भी बढेगीं...लेकिन इन सब का जिम्मेवार कौन है...हमीं लोग हैं।
    आप की पोस्ट पढ कर याद आ गया ...कि उस समय यदि कोई बच्चा छुप कर कोई गलत काम करता था तो अध्यापक या अध्यापिका जरा सी गीदड़ भभकी ही देती थी तो डर से बच्चा सच उगल देता था और आज...अब तो भगवान ही मालिक है..

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