20 दिसंबर 2011

कल नाराज़ थी जिंदगी....

कल नाराज़ थी जिंदगी ,
बहुत शिकायत थी उसे मुझसे ,
रोते हुए मुझे शिकायत कर रही थी ,
अबे तू इतने दिन कहाँ खो गयी थी ???
मैंने हौलेसे मुस्कुरा दिया ,
और धीरेसे कहा ,
तुमने मुझे कितनी बार सताया ??
ये भी तो याद कर ले की कितनी बार रुलाया ???
मैंने ख़ामोशीकी चादर लपेटे हुए
तुम्हे तो ये कभी नहीं बताया ,
की तुने तो मुझे हरदम रुलाया !!!!
न शिकवा न शिकायत कभी की
सोचा तू किसी और के लिए मशरूफ रही होगी !!!
फिर भी आज जिंदगी तू दोस्त बनकर गले मिलने आई ,
तेरी शिकायतसे मैं थोडा गभराई.....
बस मेरी तरह बिना जिंदगी के जीना सिख ले ,
हंस न सके कभी तो चुपकेसे रोना सिख ले ,
अश्क कोई देख न सके तेरे इस लिए थोडा पर्दा करना सिख ले ,
शाम ढले जब तो जाते हुए एक झलक
मेरी और देखकर मुस्कुराना सिख ले .......
दोस्ती और प्यार ये तो खुदा की नियामत है
उसे आझमाना छोड़ दे ,
जो भी है तेरे पास उसे संभाल कर दिलमे रखना सिख ले .....

2 टिप्‍पणियां:

  1. यह सब सीख लिया तो जिंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं होगी ...
    जिंदगी जीने की अदा सिखाती खूबसूरत कविता !

    उत्तर देंहटाएं
  2. रिश्तेदारों से नफरत और मुहब्बत , शिकवे शिकायत ....कभी इन रिश्तों से प्रेम तो कभी घिन ...
    इसी का नाम जीवन है !

    उत्तर देंहटाएं

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