30 सितंबर 2011

हर करवट हर सिलवट

हर करवट हर  सिलवट एक लकीर खींचती है ,
वक्तके वो आयने होते है ....
कुछ गहरी कुछ उभरी वो कहीं एहसासोंके 
दायरे होते है ....
ये दायरे एक जंजीर बन जाते है 
जकडकर रखी एक सोच उसमे कैद रह जाती है ....
ये गुजरे हुए वक्त के आयने दर आयने 
अक्स बदलते रहते है खुद के ....
वो आयने के बाजु में एक खिड़की भी होती है ....
बस आयनेसे नज़र उठाकर खिड़कीके बाहर झाँख लो जरा ....
वो करवट ,वो सिलवट वो लकीरें 
उसके आगे एक असीम आसमान  नज़र आएगा ....
आने वाले वक्त की सरहद के पार 
सूरज शमा बनकर उजागर होता नज़र आएगा ....

4 टिप्‍पणियां:

  1. कल 01/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. दृष्टि बदलने से कितना परिवर्तन हो जाता है, इसका खूबसूरत एहसास आपने दिलाया।

    उत्तर देंहटाएं
  3. दृष्टि बदलने से कितना परिवर्तन हो जाता है, इसका खूबसूरत एहसास आपने दिलाया।

    उत्तर देंहटाएं

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