28 अगस्त 2011

चलो एक बार फिर ....



चलो एक बार फिर हम अजनबी हो जाते है ,


इस दुनियाके एक अनजान शहरमें फिरसे गुम हो जाते है ....


ना कोई जान हो ना पहचान हो ....


एक अजनबी जगहमें हर सड़क हर मकान हर गली भी अनजान ....


बस यहाँ शायद एक दिन आकर मेरी पहचान छुप गयी है ,


ये मेरा अंदेसा है ...


मैं तो जीना सिख गयी थी शोरमें , बनावटमें , जूठी मुस्कुराहटसे भरे चेहरोंमें ,


पर उसे ये दुनिया रास ना आई ,


एक रात मेरे सिरहाने अपने जाने की एक चिठ्ठी छोड़कर वो चली आई ,


ये जगह कुछ ऐसी ही लगी जिसके बारेमें तनहाईमें वो जिक्र करती थी ,


इस गलीमें फिर उससे मुलाकात हो जाए ....


फिर एक बार हम दोनोंका साथ हो जाए ....


फिर एक बार मैं उससे और वो मुझसे से कहे ....


मैं और मेरी तनहाई अक्सर ये बाते करते है ......


चलो तुम्हारे नए शहर में रुकू


या फिर तुम मेरे साथ घर लौटोगी ????

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